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उसने भुलाया हो न हो (ग़ज़ल) "राज"

२१२२  २१२२  २१२२  २१२

बारहा सजदा करेंगे खुश खुदाया हो न हो

इस अकीदत का कभी एजाज़ पाया हो न हो

 

जान रख दें उस ख़ुदा के सामने तेरे लिए  

सर किसी के सामने हमने झुकाया हो न हो

 

सींचते उसकी जड़ों को आज भी हम प्यार से

वक़्त हमने छाँव में उसकी बिताया हो न हो

 

याद में उसकी हमेशा हम लिखेंगे हर ग़ज़ल

हम भुला सकते नहीं उसने भुलाया हो न हो

 

काश जलकर  हम उजाला कर सकें उसके लिए  

दीप उसने आज घर अपने जलाया हो न हो

 

लिख दिया है नाम अपना उस समंदर के निहाँ

गेसुओं ने मौज की उसको मिटाया हो न हो

 

चाँद की महफ़िल सजी है झिलमिलाती चाँदनी   

बज्म में उसकी चलें हम को बुलाया हो न हो

 

वादिए शादाब में ढूँढे नदी  अपने निशाँ

अब्र उसकी जिंदगी में ‘राज’ आया हो न हो  

*************************************

बारहा =हमेशा, सजदा =पूजा, एजाज़=चमत्कार ,जादू

निहाँ =अन्दर, अकीदत =आस्था ,श्रद्धा, वादिए शादाब =हरी भरी वादी

अब्र =बादल

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2014 at 3:44pm

शिज्जू भाई आपकी उत्साह वर्धन करती प्रतिक्रिया आह्लादित कर गई तहे दिल से आभारी हूँ. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 23, 2014 at 2:28pm

वाह आदरणीया राजेश दीदी बहुत बढ़िया पूरी ग़ज़ल अच्छी
//सींचते उसकी जड़ों को आज भी हम प्यार से
वक़्त हमने छाँव में उसकी बिताया हो न हो//

खासतौर पे यह शेर बहुत पसंद आया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2014 at 10:41am

आ० गिरिराज जी, ग़जल आपको पसंद आई उसके अशआर उनके भाव आपको प्रभावित किये मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2014 at 10:40am

जितेन्द्र गीत जी ग़ज़ल पर सर्वप्रथम प्रतिक्रिया के लिए आभार ,ग़ज़ल आपको पसंद आई तहे दिल से बहुत- बहुत शुक्रिया. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2014 at 9:31am

आदरणीया राजेश जी , बहुत लाजवाब ग़ज़ल कही है , सभी शे र एक से बढ़्कर एक हैं , तहे दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

जान रख दें उस ख़ुदा के सामने तेरे लिए  

सर किसी के सामने हमने झुकाया हो न हो

 

सींचते उसकी जड़ों को आज भी हम प्यार से

वक़्त हमने छाँव में उसकी बिताया हो न हो -------- दोनो अशाअर के लिये आपको कोटिशः बधाइयाँ ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 23, 2014 at 8:48am

काश जलकर  हम उजाला कर सकें उसके लिए  

दीप उसने आज घर अपने जलाया हो न हो..........यह शेर बहुत पसंदीदा हुआ

बहुत खुबसूरत गजल, आदरणीया राजेश जी दिली दाद कुबूल कीजिये

 

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