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मुझे चिंता में डूबे देख
तुम दुहाई देते
जब तक मेरा हाथ है
तुम्हारे हाथ में
मेरी सांसें
तुम्हारी साँसों में महकती है
विश्वास है महत्वाकांक्षा के घोड़ों पर
जो हर बाधा पार कर लेंगे
जब तक हूँ मैं जीवित
तुम खुद को अकेला मत समझो
मैं हूँ ना हमेशा तुम्हारे साथ
तुम्हारा साया बनकर

वोही साया ढूढ़ती हूँ
चारों ओर
आठों पहर
शायद
साया खो गया है
मुझ में ही कहीं
जैसे दोपहर के सूर्य में
मेरी परिछाई
उसी से तो पाया है मैंने वजूद
अपने होने का
और वो महत्वाकांक्षा के घोड़े
दौड़ रहे हैं सरपट
तुम्हारे विश्वास के साथ
हर बाधा को पार करते हुए
...................................

   मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 632

Comment

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Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:58pm

आदरणीय मदन मोहन जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:58pm

आदरणीय जितेन्द्र जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:58pm

आदरणीय केवल जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:57pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:57pm

आदरणीया मीना पाठक जी आपको रचना पसंद आई मेरी लेखनी को बल मिला हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on March 7, 2014 at 7:56pm

आदरणीय भाई मनोज जी खुबसूरत कविता के साथ आप ने जो अनुमोदन किया है उसके लिए आभारी हूँ 

Comment by Madan Mohan saxena on March 7, 2014 at 5:30pm
सुंदर रचना
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 6, 2014 at 11:36pm

बहुत सुंदर,मन को छू जाती रचना. बधाई आदरणीया सरिता जी

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 6, 2014 at 8:40pm

आ0 सरिता जी, बहुत ही सुन्दर व सात्विक चिंतन भाव में बढ़िया कविता। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by annapurna bajpai on March 6, 2014 at 3:57pm

आ0 सरिता भाटिया जी सुंदर भाव युक्त रचना हेतु बधाई स्वीकारें । 

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