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ग़ज़ल : सदा सच बोलता है जो कभी अफ़सर नहीं होता

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

कहीं भी आसमाँ पे मील का पत्थर नहीं होता

भटक जाता परिंदा, गर ख़ुदा, रहबर नहीं होता

 

कहें कुछ भी किताबें, देश का हाकिम ही मालिक है

दमन की शक्ति जिसके पास हो, नौकर नहीं होता

 

बचा पाएँगी मच्छरदानियाँ मज़लूम को कैसे

यहाँ जो ख़ून पीता है महज़ मच्छर नहीं होता

 

मिलाकर झूठ में सच बोलना, देना जब इंटरव्यू

सदा सच बोलता है जो कभी अफ़सर नहीं होता

 

ये पीली पत्तियाँ, पत्ते हरे आने नहीं देतीं

अगर इनको गिराने के लिये पतझर नहीं होता

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 784

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 4, 2014 at 11:39am

बहुत बहुत शुक्रिया वीनस जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 4, 2014 at 11:29am

बहुत बहुत शुक्रिया डॉ. सूर्या बाली "सूरज" साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 4, 2014 at 11:22am

बहुत बहुत शुक्रिया आशीष नैथानी 'सलिल' जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 1, 2014 at 6:04pm

ग़ज़ल का मतला बहुत पसंद आया, मकता भी बढ़िया हुआ है 

मिलाकर झूठ में सच बोलना, देना जब इंटरव्यू

सदा सच बोलता है जो कभी अफ़सर नहीं होता................व्यस्था के सच ऐसे ही होते हैं 

इस उम्दा ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 2:06am

इस क़ामयाब ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई, आदरणीय धर्मेन्द्रजी.

सभी अशआर में गहनता पिरोयी गयी है. लेकिन निम्न अशआर ने वाकई ध्यान खींचा है -

बचा पाएँगी मच्छरदानियाँ मज़लूम को कैसे

यहाँ जो ख़ून पीता है महज़ मच्छर नहीं होता

ये पीली पत्तियाँ, पत्ते हरे आने नहीं देतीं

अगर इनको गिराने के लिये पतझर नहीं होता...

ढेर सारी बधाई स्वीकार करें.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on March 24, 2014 at 10:31pm

वाह! बहुत खूब! सभी अशआर बेहतरीन हैं.

यह शेर बहुत ही बेहतरीन है-

//बचा पाएँगी मच्छरदानियाँ मज़लूम को कैसे

यहाँ जो ख़ून पीता है महज़ मच्छर नहीं होता//

आपको बहुत-बहुत बधाई!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2014 at 8:54pm

क्या लाज़वाब ग़ज़ल कही है हर एक शे'र पर दाद कबूल करें .

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 24, 2014 at 5:20pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है.. इस शेर पे ख़ास तौर पे दाद देना चाहूँगा.

मिलाकर झूठ में सच बोलना, देना जब इंटरव्यू

सदा सच बोलता है जो कभी अफ़सर नहीं होता

Comment by विजय मिश्र on March 24, 2014 at 4:20pm
जमाने के हिसाब से कमाल की बातें कहीं धर्मेंद्र्जी , गजल का अन्दाज आला है |बधाई इस बेहतरीनी के लिए |
Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 12:50am

वाह भाई आपके अपने अंदाज़ की ग़ज़ल है
ढेरो दाद

कृपया ध्यान दे...

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