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ग़ज़ल - सबके सत्कर्म ही फलते तो अच्छा था - पूनम शुक्ला

2122 1222 2222

आप बस रोज यूँ मिलते तो अच्छा था
दर्द दिल के सभी टलते तो अच्छा था

काट डालीं कतारें तुमने पेड़ों की
पेड़ ठंढ़ी हवा झलते तो अच्छा था

झाँकते क्यों हैं पत्तों से अब अंगारे
शाख पर फूल ही खिलते तो अच्छा था

आग में क्यों यूँ जल जाते हैं परवाने
उनके मद लोभ ही जलते तो अच्छा था

अब तो तौकीर भी दौलत से मिलती है
सबके सत्कर्म ही फलते तो अच्छा था

हाँ सज़ावार को मिलती है अय्याशी
वो तो बस हाथ ही मलते तो अच्छा था

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 7, 2014 at 9:44pm

आदरणीया पूनम शुक्ला जी 

ग़ज़ल पर सुन्दर प्रयास हुआ है... पर काफिया निर्धारण ही दोष पूर्ण हो गया है 

मतले में मिलते के साथ टलते लेने पर सिनाद दोष उत्पन्न होगा ....

ग़ज़ल पर काफी उपयोगी पोस्ट्स और चर्चाएँ मंच पर उपलब्ध हैं , आप उन्हें अवश ही पढ़ें 

इस प्रयास पर हार्दिक शुभकामनाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2014 at 6:40pm

आदरणीया पूनम जी , ग़ज़ल बहुत खूब सूरत हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥ आदरणीया बह्र के विषय मे थोड़ी शंका है  , मान्य बह्र मे से है या नही ॥  गुणी जनो का इंतिज़ार किया जाना चाहिये ॥

Comment by विजय मिश्र on March 26, 2014 at 4:40pm
"काट डालीं कतारें तुमने पेड़ों की
पेड़ ठंढ़ी हवा झलते तो अच्छा था| - कुदरत की नुमायन्दगी करता है और पूरी गजल .... बस वाह -वाह |साधुवाद पूनमजी
Comment by Poonam Shukla on March 26, 2014 at 9:31am
कृपया काफ़िया के बारे में बताएँ - मिलते के साथ जलते ,टलते का उपयोग सही है या नहीं या ये दोषपूर्ण है ।
Comment by annapurna bajpai on March 25, 2014 at 10:59pm

शानदार गजल , बहुत बधाई आ0 पूनम जी । 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2014 at 5:47pm

आदरणीया पूनम जी बहुत ही शानदार ग़ज़ल लिखी है आपने ..सादर बधाई के साथ 

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 2:27pm

वाह , बहुत खूब ग़ज़ल  हुई है आदरणीया !!

Comment by Sarita Bhatia on March 25, 2014 at 10:17am

पूनम जी बहुत खूबसूरत गजल 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 25, 2014 at 8:51am

अच्छी तरह निभाया है आपने..पर ये मौलिक बे'हर नहीं प्रतीत होती. मुबारकबाद


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 24, 2014 at 9:58pm

वाह वाह, अच्छी ग़ज़ल हुई है,

आग में क्यों यूँ जल जाते हैं परवाने
उनके मद लोभ ही जलते तो अच्छा था

यह शेर अधिक पसंद आया, दाद कुबूल करें।

कृपया ध्यान दे...

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