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न जानें कितने जीवन से परिक्रमा
ही तो करती आई हूँ ,
क्या पाया ?क्या खोया ?
पता नहीं भूली हूँ माया के जाल में ।

बस एक मेरा "मैं "
तैयार रहता मुझ पर हर दम,
कहता, मैं ही हूँ सबसे अच्छा ।

पर ये क्या सच है ?
नहीं ये हमारे "मैं "
का ही भ्रम है ।

घूमी हूँ यहाँ से वहाँ ,
लगाईं हैं कई जन्मों की
परिक्रमाएँ,
चुनी हैं मायेँ कई,
हर पल माना खुद को सही।

क्या ये सच है?
विवेक कहता नहीं ,
ये तेरी मूढ़ता का ज्वर है ।

हे प्रभु बिन सर की परिक्रमा से बचाना,
सार गर्भित हो वही परिक्रमा मुझसे करवाना ।
मैं समझूंगी भाग्यशाली खुद को,

हे नाथ मेरे "मैं "को समूल नष्ट करना ।

मौलिक व अप्रकाशित
कल्पना मिश्रा बाजपेई

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Comment by Saurabh Pandey on April 7, 2014 at 12:52pm

रचना के कथ्य पर बाद में आऊँगा आदरणीया कल्पनाजी. पहली उत्सुकता बनी है कि आपने पंक्तियों का निर्वहन कैसे किया है.
सादर
 

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on March 31, 2014 at 4:03pm

स्मृतियो के भँवर जाल में खोया पाया के भाव उबरने की कामना लिये एक अच्छी रचना के लिये बधाई !!!!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 31, 2014 at 9:41am

बहुत सुंदर भाव, बधाई आदरणीया कल्पना जी

Comment by vijay nikore on March 30, 2014 at 5:40am

भावनाएँ अच्छी पिरोई हैं। बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on March 28, 2014 at 5:06pm
बहुत  ही सुन्दर भावात्मक प्रस्तुति .. बधाई ...........................

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