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आखिर, कितने दिनों के वास्ते ?

खिलना नहीं है बाग में

मिलना है जिसको खाक में

ध्यान में उसका धरूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

विश्वास अपनों का धरूँ

उपहास अपना क्यों करूँ ?

इतिहास अपना ही लिखूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अवसाद सपनों पर करूँ

फरियाद अपनों से करूँ

नित याद में खोई रहूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अभिमान मन की भूल है 

अरमान मन की चूक है

इस चूक को वरदान समझूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

आगोश मैं उसकी चुनूँ 

खामोश मैं उसमें रहूँ

जो है सदा ही शाश्वत

मैं चलूँ, चलती रहूँ 

चुन लूँ उसी के रास्ते

जी लूँ उसी के वास्ते। 

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 29, 2014 at 9:37am

विश्वास अपनों का धरूँ

उपहास अपना क्यों करूँ ?

इतिहास अपना ही लिखूँ

कितने दिनों के वास्ते ? वाह्ह्ह बहुत सुन्दर प्रस्तुति है कल्पना जी हार्दिक बधाई.मन में उपजते प्रश्नों को बहुत खूबसूरती से ढाला है शब्दों में भाव ,लय प्रवाह सभी द्रष्टिकोण से पसंद आई रचना.  

Comment by kalpna mishra bajpai on April 14, 2014 at 9:59pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी हार्दिक शुक्रिया/सादर

Comment by kalpna mishra bajpai on April 14, 2014 at 9:55pm

आदरणीय सुरेन्द्र कुमार शुक्ला भ्रमर जी आपको रचना पसंद आई हमारे अहो भाग्य। हार्दिक आभार सर/सादर   

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 14, 2014 at 7:19pm

आगोश मैं उसकी चुनूँ 

खामोश मैं उसमें रहूँ

जो है सदा ही शाश्वत

मैं चलूँ, चलती रहूँ 

चुन लूँ उसी के रास्ते

जी लूँ उसी के वास्ते। 

आदरणीया कल्पना जी। बहुत सुन्दर भाव और उपर्युक्त पंक्तियाँ बस उसी का हो के रह जाना है
भ्रमर ५

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 14, 2014 at 9:13am

आदरणीया कल्पना जी , एक सुन्दर गीत रचना के लिये हार्दिक बधाइयाँ .

Comment by kalpna mishra bajpai on April 11, 2014 at 10:13pm

आ० मीना दी लय में बधाई देना मेरे मन को भा गया हार्दिक आभार। सादर

Comment by kalpna mishra bajpai on April 11, 2014 at 10:11pm

आदरणीय विजय मिश्रा जी हार्दिक आभार। सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on April 11, 2014 at 10:10pm

आ० नीरज सर हार्दिक आभार आपका। सादर  

Comment by बृजेश नीरज on April 11, 2014 at 7:35pm

बहुत सुन्दर रचना! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by विजय मिश्र on April 11, 2014 at 5:23pm
प्रसंशा के शब्द चूक रहे हैं ,कितना मौलिक विषय !कितने स्पष्ट रूप में भावार्पण !धन्य,साधुवाद कल्पनाजी |

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