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मानव

मानव इस संसार का, स्वयं बृह्म साकार।
दंगा आतंक द्वेष को, खुद देता आकार।।1

मानव मन का दास है, पल पल रचता रास।
अन्तर्मन को भूल कर, बना लोक का हास।।2

तंत्र-मंत्र मनु सीख कर, चढ़ा व्यास की पीठ।
करूणाकर सम बोलता, इन्द्रराज अति ढीठ।।3

स्वर्ग जिसे दिखता नहीं, वह है दुर्जन धूर्त।
मात-पिता के चरण में, चौदह भू-नभ मूर्त।।4

पाठ पढ़े हित प्रेम का, कर्म करे विस्तार।
ज्ञान सुने ज्ञानी बने, भाव भरें संस्कार।।5

सीधा उल्टा सब चले, दुनियॉं चक्र आकार।
साधु संत सत्यम कहें, सुख फकीर का सार।।6

कण-कण में जो रम रहा, तन मन का दरबान।
मानव उसको भूल कर, लूटे रज परिधान ।। 7

के0पी0सत्यम- मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 2, 2014 at 7:36pm

आ0 विजय भाई जी, आपके स्नेह और सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by विजय मिश्र on April 2, 2014 at 2:19pm
वाह केवल भाई , सारगर्भित , रचना के लिए आभार
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:42am

आ0 अन्नपूर्णा जी, आपके स्नेहिल सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:40am

आ0 कुन्ती दी'जी, आपके स्नेह और सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:36am

आ0 लक्ष्मण सर जी, आपका बहुत - बहुत आभार।  सादर,

Comment by annapurna bajpai on March 31, 2014 at 11:23pm

 सुंदर दोहे , बधाई आपको आ0 केवल भाई जी । 

Comment by coontee mukerji on March 31, 2014 at 5:15pm

बहुत  सुंदर दोहे.......मानव मन का दास है, पल पल रचता रास।
अन्तर्मन को भूल कर, बना लोक का हास।।2

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 31, 2014 at 12:19pm

सुन्दर दोहे रचे है | हार्दिक बधाई 

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