कभी कभी खो जाता हूँ ,
भ्रम में इतना कि
एहसास ही नहीं रहता कि
तुम एक परछाई हो..
पाता हूँ तुम्हें खुद से करीब
हाथ बढ़ा कर छूना चाहता हूँ.
हाथ आती है महज शुन्यता .
स्वप्न भंग होता है ..
पर सत्य साबित होता है
क्षणभंगुर.
स्वप्न पुनः तारी होने लगता है.
पुनः आ खड़ी होती हो
नजरों के सामने ..
नीरज कुमार नीर
मौलिक एवं प्रकाशित
Comment
सुन्दर भाव, सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई।
आदरणीया डॉ प्राची सिंह साहिबा आपको कविता पसंद आयी , आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ...
आपका हार्दिक आभार आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी .
स्वप्नों की क्षणभंगुरता, उनको पकड़ लेने की अधूरी ख्वाहिश, पर काफी मंथन करती सुन्दर आत्माभिव्यक्ति
हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति बधाई आदरणीय
आदरणीय बृजेश जी हार्दिक आभार आपका .. बहुत दिनों पश्चात मेरे किसी पोस्ट पर आये .. आपकी बात नोट कर ली है , सुधार कर लूँगा ..आपका बहुत धन्यवाद .
अच्छी कविता है! बहुत बधाई!
//पर सत्य साबित होता है// इस पंक्ति में 'पर' शब्द की बहुत आवश्यकता नहीं थी.
'कि' के इस्तेमाल में कोई दिक्कत नहीं. कविता में गद्यात्मकता वाक्य-प्रयोग और भाव-शून्यता के कारण आती है.
आ. लडिवाला साहब आपका हार्दिक आभार.
आ. जीतेन्द्र भाई .. हार्दिक आभार.
आपका हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब.
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