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कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

माँ की छोटी कोख में, पूत रहा नौ माह,

माँ को आश्रम भेज कर, मिली पूत को राह |

मिली पूत को राह, नहीं माँ वहां अकेली |

घरको से थी दूर, बहुत पर मिली सहेली

कह लक्ष्मण कविराय, पूत करले चालाकी

उसका ही सम्मान, करे जो पूजा माँ की |

(२)
परछाई भी दिख रही, अपने बहुत करीब

हाथ बढ़ा कर छू सकूँ, ऐसा नहीं नसीब |

ऐसा नहीं नसीब, भ्रमित मन होता इतना

स्वप्न मात्र संयोग, मिले नसीब में जितना

कह लक्ष्मण कविराय, स्वप्न में फटी बिवाई

उसे डराती देख, स्वयं उसकी परछाई ||

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 493

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 24, 2014 at 7:29pm

कुंडलिया छंद पसंद आई आपको,  हार्दिक आभार आपका श्री गिरिराज भंडारी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 24, 2014 at 6:40pm

छंद पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 24, 2014 at 6:25pm

कुंडलियाँ छंद पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री अरुण शर्मा "अनंत" जी |"घरको से थी दूर, बहुत पर मिली सहेली"

इसको यूँ संशोधित किया जाना प्रस्तावित है भाई श्री अनंत जी -

दूर हुआ परिवारमिली पर वहां सहेली 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 24, 2014 at 6:10pm

हार्दिक आभार आपका श्री जितेन्द्र "गीत"भाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2014 at 8:28pm

आदरनीय लक्ष्मण भाई , बहुत बढ़िया कुंडलिया रचना की है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ! आदरणीय अरुण भाई जी से सहमत हूँ ,

घरको से दूर ?

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 23, 2014 at 8:17pm

करे जो पूजा माँ की |

आदरणीय श्री लड़ीवाला जी 

सत्य . अनुपालन योग्य 

सादर बधाई .

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 23, 2014 at 11:49am

आदरणीय सर दोनों ही कुण्डलिया छंद बहुत ही शानदार बन पड़े हैं सुन्दर सटीक कुण्डलिया छंद पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

प्रथम कुण्डलिया छंद में "घरको से थी दूर" स्पष्ट नहीं लगा आप भी देख लें.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2014 at 7:57am

बहुत सुंदर कुंडलियाँ रची आपने आदरणीय लक्ष्मण जी, हार्दिक बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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