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डगमगा जाते यहाँ ईमान कितने (ग़ज़ल 'राज')

२१२२  २१२२  २१२२

साधुओं के भेष में शैतान कितने

लूटते विश्वास के मैदान कितने   

 

फितरतें इनकी विषैली अजगरों सी   

डस चुके हैं जीस्त में इंसान कितने  

 

इस सियासी दौर में गुलज़ार हैं सब

रास्ते जो  थे कभी वीरान कितने

 

हाथ में इतनी मिठाई देख कर वो  

 भुखमरी से जूझते हैरान कितने

 

छीनना ही था हमेशा काम जिनका 

आज देते जा रहे हैं दान कितने

 

हड्डियाँ फेंकी उन्होंने सामने जो 

डगमगा जाते यहाँ ईमान कितने                                     

                                      

धर्म की दीवार जिनको बाँटती हैं

आज आँगन वो  यहाँ सुनसान कितने

क्या भरोसा हम करें उस मौलवी का

खुद गली में बिक रहे भगवान् कितने

 

आम जनता आज फिर ये देखती है

झूठे वादे फिर चढ़े परवान कितने  

 

‘राज’ बगुले चल रहे हंसो की माफ़िक

बन रहे हैं शक्ल से अनजान कितने

__________

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 23, 2014 at 9:30pm

आ० गिरिराज जी, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना से उत्साहित हूँ आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ हार्दिक आभार आपका. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2014 at 8:55pm

आदरणीया राजेश जी , पूरी गज़ल बहुत सुन्दर बन पड़ी है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें !!

‘राज’ बगुले चल रहे हंसो की माफ़िक

बन रहे हैं शक्ल से अनजान कितने - --  बहुत खूब , बधाइयाँ !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 23, 2014 at 11:20am

मुकेश वर्मा 'चिराग'जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से आभार आपका. 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 23, 2014 at 11:13am

आदरणीय राजेश कुमारी जी
बहुत बढ़िया.. बहुत अच्छी लगी मुझे आपकी ये पेशकश. मुबारक हो

‘राज’ बगुले चल रहे हंसो की माफ़िक

बन रहे हैं शक्ल से अनजान कितने


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 23, 2014 at 9:59am

जितेन्द्र गीत भैया जी, ग़ज़ल के शेर आपको प्रभावित किये,मेरा लिखना सार्थक हुआ  दिल से आभार आपका . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 23, 2014 at 9:57am

आ० उमेश कटारा जी आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से आभार आपका. 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2014 at 9:35am

साधुओं के भेष में शैतान कितने

लूटते विश्वास के मैदान कितने..........किस पर विश्वास करें?

हड्डियाँ फेंकी उन्होंने सामने जो 

डगमगा जाते यहाँ ईमान कितने..........हर तरफ देखने को मिल रहा है

आम जनता आज फिर ये देखती है

झूठे वादे फिर चढ़े परवान कितने ..........कटु सच्चाई

बहुत सुंदर सामयिक गजल कही आपने आदरणीया राजेश दीदी, दिली बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by umesh katara on April 22, 2014 at 10:34pm

वाहहहहहहह उम्दा गजल कही है आपने सादर नमन 

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