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ग़ज़ल ‘ कल तलक था बुलंदियो पर वो ‘ --- 'चिराग'

2122 1212 22

 

कौन जीता है कौन हारा है

मौत ने कर दिया इशारा है

 

कल तलक था बुलंदियो पर वो

आज क़िस्मत ने उसको मारा है

 

मेरी हिम्मत न टूटने देना

मेरे मौला तेरा सहारा है

 

माँग लो जो भी माँगना तुमको

सामने टूटता वो तारा है

 

बेवफ़ाई से हो गया पागल

प्यार को कब मिला किनारा है

 

छोड़ दो मारते उसे क्यों हो

मुफ़लिसी, वक़्त का वो मारा है

 

खा के देखूं तो शादी का लड्डू

सोचता बस यही कुँवारा है

 

लूला, लंगड़ा भले अपाहिज हो

माँ को बेटा सदा दुलारा है

 

रौशनी कम हुई 'चिराग' की अब

धुंधला-धुंधला सा बस नज़ारा है

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 598

Comment

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Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on May 15, 2014 at 1:04pm

शुक्रिया सत्य नारायण जी

Comment by Satyanarayan Singh on May 9, 2014 at 4:23pm
इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारे आदरणीय मुकेश जी
Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on May 3, 2014 at 6:35pm

आदरणीय जितेंद्र जी
शुक्रिया आपका

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2014 at 12:12am

बहुत खुबसूरत गजल कही आपने आदरणीय मुकेश जी

माँग लो जो भी माँगना तुमको

सामने टूटता वो तारा है..................बहुत सुंदर ख्याल. दिली बधाई आपको

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 30, 2014 at 10:26pm

आदरणीय सिज़्जु जी
हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 30, 2014 at 10:17am

//कल तलक था बुलंदियो पर वो

आज क़िस्मत ने उसको मारा है//  

आदरणीय मुकेश भाई बहुत खूब वाह दिली दाद कुबूल करें

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 30, 2014 at 8:33am

आदरणीया राजेश कुमारी जी
हौसला अफज़ाई के लिए शुक्रिया आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 29, 2014 at 8:04pm

खा के देखूं तो शादी का लड्डू

सोचता बस यही कुँवारा है------जरूर खाओ सोचना क्या ...वाह्ह 

 

लूला, लंगड़ा भले अपाहिज हो

माँ को बेटा सदा दुलारा है-----जबरदस्त भाव ...एक दम सच 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई चिराग जी सभी शेर सुन्दर बने हैं ...दिली दाद कबूलिये .

 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 29, 2014 at 4:23pm

आदरणीय रमेश जी
शुक्रिया आपका

Comment by रमेश कुमार चौहान on April 29, 2014 at 2:58pm

रौशनी कम हुई 'चिराग' की अब

धुंधला-धुंधला सा बस नज़ारा है-------------बढि़या
सफल प्रयास के बधाई आदरणीय मुकेशजी

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