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22122

लाचार हो क्या?

सरकार हो क्या?

छुट्टी पे छुट्टी,

इतवार हो क्या?

छूते ही ज़ख़्मी,

औजार हो क्या?

बेचा है खुद को,

बाज़ार हो क्या?

तारीफ कर दूँ,

अशआर हो क्या?

खुद से ही बातें,

बीमार हो क्या?

*****************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 793

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Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:39pm

हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी। … सादर

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:39pm

हार्दिक आभार आदरणीय भुवन जी। … सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 23, 2014 at 3:04am

ग़ज़ब ! मज़ा आगया, राम शिरोमणि जी. कहन में सान्द्रता अच्छी लगी.

Comment by भुवन निस्तेज on May 16, 2014 at 12:11am

इसे कहते है गागर में सागर, बधाई कबूल करे.

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2014 at 5:11pm

उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय आशुतोष   जी। …    सादर 

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2014 at 5:11pm

उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज  जी। …    सादर 

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2014 at 5:10pm

उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय गणेश   जी। …    सादर 

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2014 at 5:09pm

बहुत बहुत आभार भाई अरुण शर्मा  जी। …    सादर 

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2014 at 5:09pm

बहुत बहुत आभार भाई जीतेन्द्र जी। …    सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2014 at 1:57pm

आदरणीय राम जी ..इतने छोटी बहर पे जिस शानदार तरीके से आपने ग़ज़ल लिखी है केबिले तारीफ़ है ..हर शेर बेहतरीन है ..आपको इस शानदार रचना के तहे दिल बधाई ..सादर 

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