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हर पतझड़ को ……

ज़िंदगी को ..हर मौसम की जरूरत होती है
उजालों को भी ...अंधेरों की जरूरत होती है

क्यों सिमटे नहीं सिमटते वो बेदर्द से लम्हे
चश्मे अश्क को .खल्वत की ज़रुरत होती है

रात के वाद-ऐ-फ़र्दा पे ..यकीं भला करूँ कैसे
यकीं को भी इक समर्पण की जरूरत होती है

मिट गयी सहर होते ही वो रूदाद-ऐ-मुहब्बत
रूहे- मुहब्बत को आगोश की जरूरत होती है

हिज़्र की सिसकियों से है नम रात का दामन
सोहबते -लब को तिश्नगी की जरूरत होती है

कुछ जल जाएंगे कुछ ...अध जले रह जाएंगे
जुगनू से ख्वाब को ..रात की जरूरत होती है

कितने ही राज़ दफन हैं .इक रात के सीने में
हर पतझड़ को .इक बहार की जरूरत होती है

सुशील सरना

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 29, 2014 at 2:22pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी  जी  रचना पर आपकी आत्मीय  अभिव्यक्ति  का हार्दिक आभार।  नेट व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।  

Comment by Sushil Sarna on May 29, 2014 at 2:22pm

आदरणीय सुरेन्दर कुमार शुक्ल जी  रचना पर आपकी आत्मीय  प्रशंसा का हार्दिक आभार।  नेट व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।  

Comment by Sushil Sarna on May 29, 2014 at 2:20pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लाड़ीवाला जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार।  नेट व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।  

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 26, 2014 at 2:53pm

कितने ही राज़ दफन हैं .इक रात के सीने में 
हर पतझड़ को .इक बहार की जरूरत होती है

सुन्दर भाव ...अच्छी रचना ....कुछ शब्द समझ में कम आये काश उनके अर्थ नीचे लिख दिए जाएँ ...
भ्रमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2014 at 11:58pm

आदरणीय सुशील भाई , सुन्दर भाव अभिव्यक्ति हुई है , सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई ॥

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 23, 2014 at 10:29am

सुन्दर और उम्दा भाव रचना के लिए बहुत बहुत बधाई 
कितने ही राज़ दफन हैं .इक रात के सीने में 
हर पतझड़ को .इक बहार की जरूरत होती है---- वाह ! यथार्थ भाव 

Comment by Sushil Sarna on May 22, 2014 at 12:13pm

आदरणीय जितेन्द्न गीत  जी रचना पर आपके स्नेह का हार्दिक आभार 

Comment by Sushil Sarna on May 22, 2014 at 12:12pm

आदरणीय विजय निकोरे जी रचना पर आपके स्नेह का हार्दिक आभार 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 22, 2014 at 10:06am

ज़िंदगी को ..हर मौसम की जरूरत होती है
उजालों को भी ...अंधेरों की जरूरत होती है.............वाह! बहुत ही सुंदर, बधाई आदरणीय शुशील जी

Comment by vijay nikore on May 22, 2014 at 9:59am

बहुत सुन्दर रचना। बधाई, आदरणीय।

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