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सुन री सखी
दो शब्द भी प्रेम के
नही लिखती
चीखें,दर्द कराहें
लिखती हूँ प्रेम से
|

उनकी बात
कम नही सजा से
तुम्हारे साथ
बिताये हुए पल
सखी कैसे कहूँ मै
|

जीवन मेला
लिए रिश्तों का रेला
जाना था दूर
रह गया अकेला
नयनो में अन्धेरा
|

आहूती स्वप्न
साँसों की है सविधा
जीवन यज्ञ
धुँआ हुई भावना
सुलगी हर आस
|

मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 759

Comment

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Comment by Meena Pathak on June 7, 2014 at 5:40pm

आप का कहा अतार्किक लगने का सवाल ही नही है आदरणीय सौरभ सर जी ,, आगे से खयाल रखूँगी 

रचना सराहने और मार्गदर्शन हेतु आभार स्वीकारें सर | सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2014 at 4:28am

आपकी प्रस्तुति सुगढ़ है.  हार्दिक बधाई आदरणीया.

चीखें, कराहें जैसे बहुवचन असंगत हैं. उस हिसाब से तो दर्दें भी होने लगेगा.

चीख या कराह भावों का बहुवचन स्वरूप भी हैं.

यदि मेरा कहा अतार्किक लगा हो तो क्षमा कीजियेगा.

सादर

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:31pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी, आदरणीय श्याम नारायण जी , सादर आभार स्वीकारें 

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:30pm

आदरणीया कुन्ती दी, आप की उत्साहवर्धन करती टिप्पणी हमेशा लिखने को प्रेरित करती है | यूँ ही स्नेह बनाये रखें | सादर 

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:28pm

आदरणीय आशुतोष जी ..आदरणीय शिज्जू जी , तहेदिल से आभार स्वीकारें सादर 

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:27pm

आदरणीय बृजेश जी त्रुटियों की तरफ इंगित करने हेतु सादर आभार 

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:26pm

आदरणीय लाडीवाला जी बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by बृजेश नीरज on June 2, 2014 at 12:06pm

अच्छी रचना है! आपको बहुत बधाई!

टंकण त्रुटियों पर ध्यान दें.

सादर!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 31, 2014 at 11:24am

जीवन मेला 
लिए रिश्तों का रेला 
जाना था दूर 
रह गया अकेला 
नयनो में अन्धेरा
 |-  वाह ! बहुत सुन्दर 

Comment by Meena Pathak on May 30, 2014 at 4:31pm
Hindi me likh nhi pa rahi hun .. aap sabhi ka tahedil se abhaar ... saadar

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