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आखिर कैसा देश है ये ? --- अरुण श्री

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि राजधानी का कवि संसद की ओर पीठ किए बैठा है ,

सोती हुई अदालतों की आँख में कोंच देना चाहता है अपनी कलम !

गैरकानूनी घोषित होने से ठीक पहले असामाजिक हुआ कवि -

कविताओं को खंखार सा मुँह में छुपाए उतर जाता है राजमार्ग की सीढियाँ ,

कि सरकारी सड़कों पर थूकना मना है ,कच्चे रास्तों पर तख्तियां नहीं होतीं !

पर साहित्यिक थूक से कच्ची, अनपढ़ गलियों को कोई फर्क नहीं पड़ता !

एक कवि के लिए गैरकानूनी होने से अधिक पीड़ादायक है गैरजरुरी होना !

 

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि बाँध बनकर कई आँखों को बंजर बना देतें हैं ,

सड़क बनते ही फुटपाथ पर आ जाती है पूरी की पूरी बस्ती !

कच्ची सड़क के गड्ढे बचे हुआ बस्तीपन के सीने पर आ जाते हैं !

बूढी आँखों में बसा बसेरे का सपना रोज कुचलतीं है लंबी-लंबी गाडियाँ !

समय के सहारे छोड़ दिए गए घावों को समय कुरेदता रहता है अक्सर !

 

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि बच्चे देश से अधिक जानना चाहतें हैं रोटी के विषय में ,

स्वर्ण-थाल में छप्पन भोग और राजकुमार की कहानियों को झूठ कहते हैं ,

मानतें हैं कि घास खाना मूर्खता है जब उपलब्ध हो सकती हो रोटी ! 

छब्बीस जनवरी उनके लिए दो लड्डू ,एक छुट्टी से अधिक कुछ भी नहीं !

 

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि माट्साब कमउम्र लड़कियों को पढाते हैं विद्यापति के रसीले गीत ,

मुखिया जी न्योता देते हैं कि मन हो तो चूस लेना मेरे खेत से गन्ने !

इनारे पर पानी भरती उनकी माँ से कहते है कि तुम पर गई है बिल्कुल !

दुधारू माँ अपने दुधमुहें की सोच कर थूक घोंट मुस्कुराती है बस -

कि अगर छूट गई घरवाले की बनिहारी भी तो बिसुकते देर न लगेगी !

 

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि विद्रोही कविताएँ राजकीय अभिलेखों का हिस्सा नहीं है !

तेज रफ़्तार सड़कें रुके हुए फुटपाथों के मुँह पर धुँआ थूक रही हैं !

बच्चों से कहो देशप्रेम तो वो पहले रोटी मांगते हैं !

कमउम्र लड़कियों से पूछो उनका हाल तो वो छुपातीं हैं अपनी अपुष्ट छाती !

माँ के लिए बेटी के कौमार्य से अधिक जरूरी है दुधमुहें की भूख !

 

वातानुकूलित कक्ष तक विकास के आँकड़े कहाँ से आते हैं आखिर ?

 

कविताओं के हर प्रश्न पर मौन रहती है संसद और सड़कें भी !

निराश कवि मिटाने लगता है अपने नाखून पर लगा लोकतंत्र का धब्बा !
.
.
.
...................................................................................... अरुण श्री !
"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 808

Comment

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Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:52am

बहुत धन्यवाद  Meena Pathak जी !

Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:52am

coontee mukerji मैम , लगता है कि निरुत्तर होना ही नियति है हम सब की !

Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:50am

सराहने के लिए बहुत धन्यवाद जितेन्द्र 'गीत'  जी !

Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:50am

शिज्जु शकूर  सर , धन्यवाद जो आपने मेरी रचना को समय दिया और उसके मर्म तक पहुँचे ! सादर !

Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:48am

 बहुत धन्यवाद Ramesh Sachdeva जी !

Comment by Arun Sri on June 4, 2014 at 10:47am

 डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर , आपसे सराहा जाना मेरे लिए संतुष्टि का विषय है ! सादर धन्यवाद आपको !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 4, 2014 at 10:04am

आदरनीय अरुण भाई , आपके हर प्रश्न गाइडेड मिसाइल की तरह हैं , जहाँ का निशाना था वहीं लगा है , बहुत खूब , बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on June 4, 2014 at 7:36am

आ0 अरुण जी , सटीक प्रश्न किए आपने , शायद सभी निरुत्तर होंगे , देश के प्रति कवि की पीड़ा साफ झलती है । आपको बधाई इस अनुपम रचना के लिए । 

Comment by Meena Pathak on June 3, 2014 at 10:51pm

साधुवाद आप को इस रचना के लिए | सादर 

Comment by coontee mukerji on June 3, 2014 at 9:36pm

अनगिंनत प्रश्नों की बौछार हो गयी.......कौन उत्तर दे....हर कोई निरुत्तर है....साधुवादधुवाद.

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