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क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

२१२२ ११२२ १२१२ २२
इश्क की मौज में जब दिल में कुछ उछलता है
चांदनी रात में शोलों सा तन ये जलता है

राहे मंजिल पे यूं तो गुल तमाम थे लेकिन
आँख जब से लड़ी तन बर्फ सा पिघलता है

बंदिशें तोड़ के कह दे तू इस जमाने से
जलने वाला तो बात बात पे ही जलता है

चूम लेती हैं हसीं रुख को जब कभी जुल्फें
क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

जुल्फ की छांव का अहसास तो किया होता
घर के साए से यकीनन ये दिल बहलता है

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 4, 2014 at 11:33am

आदरनीय गोपाल सर ..मुझे इसके अन्य मायनो के सम्बन्ध में जानकारी नहीं हैं .कृपा कर जानकारी देने का कष्ट करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 4, 2014 at 10:40am

आदरणीय आशुतोष भाई , बढ़िया ग़ज़क कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।

चूम लेती हैं हसीं रुख को जब कभी जुल्फें
क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है -- खयाल अच्छा है , भाई बधाई ॥

Comment by annapurna bajpai on June 4, 2014 at 7:32am

सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें , आ0 आशुतोष जी । 

Comment by Meena Pathak on June 3, 2014 at 11:20pm

बेहतरीन गज़ल हुई आदरणीय .. सादर बधाई स्वीकारें 

Comment by coontee mukerji on June 3, 2014 at 9:33pm

जुल्फ की छांव का अहसास तो किया होता
घर के साए से यकीनन ये दिल बहलता है....क्या बात है.

Comment by Abhinav Arun on June 3, 2014 at 7:14pm
भावपूर्ण सुन्दर ग़ज़ल डॉ आशुतोष जी , मुबारकबाद !!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 3, 2014 at 1:17pm

बंदिशें तोड़ के कह दे तू इस जमाने से
जलने वाला तो बात बात पे ही जलता है..........बहुत खूब, बधाई आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 2, 2014 at 4:25pm

//बंदिशें तोड़ के कह दे तू इस जमाने से
जलने वाला तो बात बात पे ही जलता है//

वाह क्या कहने आदरणीय डॉ आशुतोष सर बहुत बढ़िया

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2014 at 5:42pm

आशुतोष  जी हम -जुल्फ के कुछ  और भी मायने होते है i कही ---- 

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