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वो नदी जो गिरि

कन्दराओं से निकल

पत्थरों के बीच से

बनाती राह

 

कितनो की मैल धोते

कितने शव आँचल मे लपेटे

अन्दर कोलाहल समेटे

अपने पथ पर,

 

कोई पत्थर मार

सीना चीर देता 

कोई भारी चप्पुओं से

छाती पर करता प्रहार

लगातार,

 

सब सहती हुई

राह दिखाती राही को

तृप्त करती तृषा सब की

अग्रसर रहती अनवरत

तब तक, जब तक खो न दे

आस्तित्व,अपने 

प्रियतम से मिल कर ||

मीना पाठक 
मैलिक अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 5:50pm

नदी को प्रतीक रूप में  प्रयोग कर प्रेम के  चरम को  बहुत सुंदर दर्शाया है आपने आदरणीया मीना पाठक जी …… हार्दिक बधाई 

Comment by annapurna bajpai on June 4, 2014 at 2:08pm

सुंदर रचना मीना दी , बधाई 

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