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दिल में उम्मीद तो होटों पे दुआ रखता हूँ

तुम चले आना मैं दरवाज़ा खुला रखता हूँ

 

ये तेरा हुस्न अगर जलता शरारा है तो क्या  

मैं भी जज़्बात की जोशीली हवा रखता हूँ

 

राहे-उल्फ़त में तू अपने को अकेला न समझ

दिल में चाहत का दिया मैं भी सदा रखता हूँ

 

ख़ुशनुमा मंज़रो - तस्वीर न गुल बूटे से 

अपने कमरे को दुआओं से सजा रखता हूँ

 

अपनी औक़ात कहीं भूल न जाऊँ ‘साहिल’

इसलिए महल में मिट्टी का घड़ा रखता हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 16, 2014 at 10:09pm

अपनी औक़ात कहीं भूल न जाऊँ ‘साहिल’

इसलिए महल में मिट्टी का घड़ा रखता हूँ................बहुत खूबसूरत ख़याल 

हार्दिक बधाई 

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 16, 2014 at 5:49pm

 .वाह! बहुत सुंदर. गजल आदरणीय शुशील जी,

Comment by MAHIMA SHREE on June 15, 2014 at 4:06pm

बढ़िया .. क्या बात है दिली  दाद प्रेषित है सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 14, 2014 at 10:37am

दिल में उम्मीद तो होटों पे दुआ रखता हूँ

तुम चले आना मैं दरवाज़ा खुला रखता हूँ.............वाह! बहुत सुंदर. बहुत कुछ कह देता हुआ मतला

 

ये तेरा हुस्न अगर जलता शरारा है तो क्या  

मैं भी जज़्बात की जोशीली हवा रखता हूँ.................क्या बात कही है .

 

बेहतरीन गजल आदरणीय शुशील जी, दिली बधाई स्वीकारिये

Comment by Meena Pathak on June 12, 2014 at 11:55pm

शानदार गज़ल हेतु बधाई स्वीकारें आदरणीय 

Comment by annapurna bajpai on June 12, 2014 at 7:40pm

सुंदर गजल हेतु बधाई आपको आ0 सुशील जी । 

Comment by umesh katara on June 12, 2014 at 7:28pm

shandaaar ghazal सुशील जी बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 12, 2014 at 6:33pm

अपनी औक़ात कहीं भूल न जाऊँ ‘साहिल’

इसलिए महल में मिट्टी का घड़ा रखता हूँ ----- लाजवाब ! बहुत बधाइयाँ , सुन्दर ग़ज़ल कही भाई सुशील जी ॥

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