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ग़ज़ल ( गिरिरज भंडारी ) --वही चाहतें हैं डरी- मरी

11212      11212       11212     11212 

कई बाग़ सूने हुये यहाँ , कई फूलों में हैं उदासियाँ

कई बेलों को यही फिक्र है , कि कहाँ गईं मेरी तितलियाँ

कभी दूरियाँ बनी कुर्बतें, कभी कुरबतें बनी दूरियाँ

ये दिलों के खेलों ने दी बहुत , हैं अजब गज़ब सी निशानियाँ

कभी आप याद न आ सके, कभी हम ही याद न कर सके

रहे शौक़ में हैं लिखे मिले , कई गम ज़दा सी रुबाइयाँ  

वो हक़ीक़तें बड़ी तल्ख़ थीं, चुभीं खार बनके इधर उधर

सुनो वो चुभन ही सुना रही ,है हक़ीक़तों की कहानियाँ

वही हालतें हैं गरीब की , वही चाहतें हैं डरी- मरी

कहीं तिफ्ल भूख से मर गया , कहीं बिक रहीं हैं जवानियाँ

मेरा ज़ख्म पीठ का भर गया , मेरा ताप सर से उतर गया

नहीं भर रहीं हैं खुदी हुई,  वो जो दरमियान थी खाइयाँ 

*******************************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2014 at 7:12am
आदरणीय सौरभ भाई , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार । छोक पर आपकी सलाह के लिये भी अलग से दिली शुक्रिया । अभी संशिधन के लिये भेज रहा हूँ ॥

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2014 at 11:57pm

इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक धन्यवाद भाईजी.

वो हक़ीक़तें बड़ी तल्ख़ थीं, चुभे खार बनके इधर उधर   =   वो हक़ीक़तें बड़ी तल्ख़ थीं, चुभीं खार बनके इधर-उधर .. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 24, 2014 at 6:50pm

आदरनीय बड़े भाई विजय जी , गज़ल को आपका आशीर्वाद मिलना , मेरे लिये बहुत खुशी की बात है । सराहना के लिये आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 24, 2014 at 6:48pm
आदरणीय सुशील शनर भाई , ग़ज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ॥
Comment by vijay nikore on June 24, 2014 at 5:49pm

बहुत ही अच्छी गज़ल लिखी है। साधुवाद, आदरणीय भाई गिरिराज जी।

Comment by Sushil Sarna on June 19, 2014 at 12:45pm

वो हक़ीक़तें बड़ी तल्ख़ थीं, चुभे खार बनके इधर उधर
सुनो वो चुभन ही सुना रही ,है हक़ीक़तों की कहानियाँ …… बहुत ही उम्दा भावों की शानदार ग़ज़ल .... हर शेर पर हमारी दाद कबूल फरमाएं आदरणीय गिरिराज भंडारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2014 at 9:33pm

आदरणीया कल्पना जी , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका शुक्रिया ॥ आपकी सलाह पर सोच कर ज़रूर सुधार करूँगा ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2014 at 9:31pm

आदरणीय गुमनाम भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2014 at 9:30pm

आदरणीय नादिर खान भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2014 at 9:29pm

आदरणीया मंजरी जी , सराहना के लिये आपका आभार ॥

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