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ग़ज़ल - - दर्द मै अपना दबा भी लूँ - ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122      2

दिन टपक के सूख जाता है

हाथ में कुछ भी न आता है

 

मै पराया , वो पराया है

कौन किसमें अब समाता है ?

 

ग़म हक़ीक़ी भी मजाज़ी भी

देख किसको कौन भाता है  

 

दर्द मै अपना दबा भी लूँ

ग़म तुम्हारा पर रुलाता है

 

खार चुभते जो रिसा था ख़ूँ

रास्ता वो अब दिखाता है

 

सूर्य तो ख़ुद जल रहा यारों

वो किसी को कब जलाता है

 

ख़्वाबों में आ आ के शिद्दत से

गाँव तो अब भी बुलाता है

 

तू न अब मायूसियाँ ही देख 

देख कोई मुस्कुराता है  

**************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 9, 2014 at 3:20pm

एक बार फिर से अच्छी ग़ज़ल, आदरणीय !

दाद दाद दाद !  .....    :-)))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:24pm

आदरणीय विजय मिश्र भाई , आपकी सराहना मे रे लिये ईनाम के समान है , आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:22pm

आदरणीय आशुतोष भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:21pm

आदरणीय नीलेश भाई , आपका शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:20pm

आदरणीय बड़े भाई  गोपाल जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:20pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:19pm

आदरणीय सुशील भाई , ज़र्रा नवाज़ी का बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:18pm

आदरणीया कुंती जी , आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:17pm

आदरणीया राजेश जी , मुक्त कण्ठ से गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 7, 2014 at 6:17pm

आदरणीया मीना जी , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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