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लघुकथा : खोटा सिक्का (गणेश जी बागी)

                       "अजी सुनती हो! देख लो तुम्हारे लाड़ले की करतूत, सेकंड इयर का रिज़ल्ट आया है, खीँच खांच के पास हुए हैं जनाब,  दिनभर दोस्तो के साथ मटरगश्ती और मारपीट करते रहते हैं, अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया है |"

                        "अब जाने भी दीजिए जी, बच्चा है, थोड़ी-बहुत ग़लतियाँ तो हो ही जाती हैं, आपको पता है,  बिटिया बता रही थी कि भाई के कारण ही कॉलेज मे कोई उसकी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करता।"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 30, 2014 at 9:13pm

आपकी लघु कथा कि ये  चार पंक्तियाँ चार मुद्दों पर प्रकाश डाल रही हैं ----(१)पिता को बेटे के भविष्य की चिंता ,(२ )माँ की अंधी ममता जो आँख बंद पर बेटे की बुराई को अच्छाई में बदलने की कोशिश कर रही है(३) बेटे के दबदबे के कारण बेटी को सुरक्षा चक्र का मिलना (४ )आज के माहौल  में बेटियाँ स्कूल कालेज में कितनी असुरक्षित 

वाह्ह्ह वाह आ० गणेश जी ,बहुत दिनों बाद आपकी कोई लघु कथा पटल पर आई ,पर क्या खूब आई ,बहुत सुन्दर ,बहुत बहुत बधाई आपको |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:48pm

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार प्रिय ब्रिजेश भाई ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:47pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, लघुकथा आप तक पहुँच गयी, मेरा प्रयास सफल हुआ, ह्रदय से आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:29pm

उत्साहवर्धन हेतु ह्रदय से आभार शिज्जू भाई । 

Comment by बृजेश नीरज on June 30, 2014 at 8:21pm
अच्छी लघु कथा आदरणीय। आपको हार्दिक बधाई।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:20pm

 उत्साहवर्धन करती टिप्पणी हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीया कल्पना रमानी जी, नौकरी के उलझनों में उलझा हुआ हूँ, सो लेखन कार्यों से आजकल विलग सा हो गया हूँ।   


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:11pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण जी, कथा जहाँ पर आपको अधूरी लगी, दरअसल वहीँ वह पूरी हो जाती है, उत्साहवर्धन हेतु ह्रदय से आभार । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:09pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया महेश्वरी कनेरी जी, आपको यह लघुकथा अच्छी लगी, मेरा प्रयास सार्थक हुआ |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 8:07pm

आदरणीय जितेन्द्र जी, आपकी सराहना सर आँखों पर, आप स्वयम अच्छी लघुकथा लिखने लगें हैं, आप द्वारा सराहा जाना मायने रखता है, बहुत बहुत आभार | 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 30, 2014 at 6:34pm
एक सच्चाई , समय है , मजबूरी है, मान्य है , पिता का कहना सहीहै पर माँ की बात भी कहाँ अमान्य है।
बहुत सुन्दर। बधाई आदरणीय बागी जी ,

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