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मन के भावो को
कल्पना की कलम से
कोरे कागज़ पर
उतारता हूँ.
शब्दों की  आड़ में,
चिंता के झाड़ से
बचाई "संवेदना" को
संवारता हूँ,
कागज की नाव पर
सपनो के सागर में
सच की पतवार लिए
हिलकोरे खाता हूँ.
डूबना -उतराना तो
खेल है जीवन का
जाने क्या आश लिए
क्षितिज तक जाता हूँ.

विजय प्रकाश शर्मा.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 8, 2014 at 8:22am

आ० सौरभ पाण्डेय जी, मार्गदर्शन के लिए बहुत- बहुत धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 7:42pm

उत्त्म ! अति उत्तम !!

सादर धन्यवाद आदरणीय. .

शब्दों के आड़ में = शब्दों की आड़ में

आश = आस

सादर

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 4, 2014 at 9:09am

धन्यवाद सह आभार आ० रमेश कुमार चौहान जी.

Comment by रमेश कुमार चौहान on July 3, 2014 at 8:18pm

बहुत खूबसूरत बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 3, 2014 at 1:01am

सराहना के शब्दों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद प्रियंका" पियु" जी.

Comment by Priyanka singh on July 2, 2014 at 5:02pm

शब्दों के आड़ में,
चिंता के झाड़ से 
बचाई "संवेदना" को 
संवारता हूँ,......बहुत खूब सर .... बधाई आपको 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 2, 2014 at 12:38pm

आ० शिज्जु शकूर जी, जितेन्द्र 'गीत जी, विजय निकोर जी, सविता मिश्रा जी, तथा लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाल जी,
आप सबों ने उत्साह वर्धन किया है . कोटिश : धन्यवाद सह आभार. यही उत्साह लेकर तो क्षितिज तक जाना चाहता हूँ.पुनः आभार

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 11:24am

मन के भावों को बहुत ही सुंदर सहज शब्द मिले, बधाई आदरणीय विजय जी

Comment by vijay nikore on July 2, 2014 at 11:16am

आपकी रचना पढ़ कर आनन्द आया। हार्दिक बधाई, आदरणीय विजय जी।

Comment by savitamishra on July 2, 2014 at 10:15am

बहुत खूबसूरत

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