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आज रिश्ते क्यों सभी को - ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

**********************

सावनों   में   फिर   हमारे   घाव   ताजा   हो  गये

रंक  सुख  से  हम  जनम के, दुख के राजा हो गये

**

साथ  माँ  थी  तो   दुखों में भी सुखों की थी झलक

माँ  गयी  है   छोड़   जब  से  सुख जनाजा हो गये

**

कल तलक जिनकी गली भी कर रही नासाज थी

आज क्यों कर वो तुम्हारे दिल के ख्वाजा हो गये                  ( ख्वाजा - स्वामी )

**

कोइ   चाहे    देह     हरना   और   कोई   दौलतें

आज  रिश्ते   क्यों  सभी  को यार  काज़ा हो गये                    ( काज़ा - शिकारी के छिपने का गड्ढा )

**

पाँच  वर्षो   से   हमें   तुम  कह  रहे  थे  रद्दियाँ

अब चुनावों के  समय  क्यों हम तकाजा हो गये                    ( तकाजा - जरूरत )

**

जिक्र भर से  जिनके  तुमको उल्टियाँ आती रही

आ सियासत में  कहो  क्यों वो ही आज़ा हो गये                   ( आज़ा - शरीर का अंग/अतिप्रिय )

**

सोचते  थे  तुम  नहीं  हो  खार  पाले  जो शजर

पतझड़ों में तो ‘मुसाफिर’  तुम भी वाज़ा हो गये            ( वाज़ा - प्रकट /हकीकत सामने आना )

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2014 at 10:24am

आ० भाई गिरिराज जी ग़ज़ल के अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2014 at 10:24am

आ० भाई जीतेन्द्र जी , उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2014 at 7:47am
आदरणीय , उम्दा गज़ल के लिये आपको बधाई ॥
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 4, 2014 at 1:16pm

कल तलक जिनकी गली भी कर रही नासाज थी

आज क्यों कर वो तुम्हारे दिल के ख्वाजा हो गये...........बहुत खूब, क्या गजब का शेर हुआ है

आदरणीय लक्ष्मण जी, आपको हार्दिक बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2014 at 11:22am

आ० मंजरी जी रचना का अनुमोदन कर उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2014 at 11:21am

आ० भाई गोपाल नारायण जी , यह तो आपका बड़प्पन है जो रचनाओं को इतना मान दे रहे हैं  l अभी तो लेखनी को बहुत ही सुधार की जरुरत  है l  ओ बी ओ परिवार का स्नेहाशीष मिलता रहा तो उसमे जरूर सुधार कर पाउँगा l स्नेहाशिस बनाये रखें l  

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:34pm
साथ माँ थी तो दुखों में भी सुखों की थी झलक
माँ गयी है छोड़ जब से सुख जनाजा हो गये.

बहुत ही भावपूर्ण आदरणीय लक्ष्मण धामी जी
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 3, 2014 at 7:06pm

धामी जी

आप तो सदाबहार  है  i क्या गजल और  क्या आखिरी शेर -साथ ही

साथ  माँ  थी  तो   दुखों में भी सुखों की थी झलक

माँ  गयी  है   छोड़   जब  से  सुख जनाजा हो गये

 

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