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सपनो का गाँव,
पीपल की छावो,
नदी का वह तट ,
नहाती जहाँ झट -पट
किनारे के लोग कभी
नहीं देखते थे एकटक .
बदल गए वो भाव
बदल गया गाँव,
झूमर औ गीत गए
रिश्ते अब रीत गए
लक्ष्मी जब भाग गई
आँखों की लाज गई
अब दीदे हुए बेशर्म
गाँव का माहौल गर्म
आतंक, भूख , भय
राजनीती देती प्रश्रय
सुख गए अब खेत,
माटी बन गई रेत,
भागे सब शहर को
कौन करे अब सेत.
पसर रहा है मौन
जिम्मेवार है कौन?
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 5, 2014 at 5:06pm

आ० रवि प्रभाकर जी,आपने साराह कर मान दिया ,आभार सह अभिनन्दन.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 5, 2014 at 5:04pm

प्रिय पारुल 'पंखुरी ' ,आपको रचना अर्थपूर्ण लगी ,आपने साराह कर मान दिया ,आभार सह धन्यवाद.
सेत=संरक्षण .यथा:मुर्गी अंडे "सेती" है.

Comment by parul 'pankhuri' on July 5, 2014 at 4:34pm

अर्थपूर्ण रचना  सेत का अर्थ नहीं समझी आदरणीय कृपया बताने का कष्ट करें 

Comment by Ravi Prabhakar on July 5, 2014 at 1:32pm

आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी
नहाती जहाँ झट -पट
किनारे के लोग कभी
नहीं देखते थे एकटक .
बदलते परिवेश का स्टीक चित्रण।
बहुत उत्कृष्ट रचना। बधाई स्वीकार करें। सादर ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 5, 2014 at 12:55pm

शर्मा जी

अहो निष्ठुर परिवर्तन  i

अजब  है तेरा नर्तन i

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