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बहुत रोया मैं,
पड़ोसी चाची के मर जाने पर
गाँव से शहर जाने पर
हाल के दंगे में
आग देखकर

डर जाने पर
खुद को लूटा के

घर जाने पर
आंसुओं ने साथ छोड़ दिया
नहीं रोया मैं,
माँ के मर जाने पर,
वो 

हर सहर के साथ

हॅसते देखना चाहती थी.
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 797

Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 16, 2014 at 8:46am

आ० आशुतोष जी,
आपकी सराहना पाकर मैं कृतज्ञ हूँ.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 15, 2014 at 4:04pm

आदरणीय शर्मा जी ..आपकी यह रचना तो सीधे दिल में उतर गयी ..ताजगी से लवरेज इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर                                  

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 13, 2014 at 8:02pm

आ० गुमनाम पिठौरागढ़ी जी ,
आपने रचना को मान दिया ,उत्साह वर्धन के लिए बहुत धन्यवाद.सादर.

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 13, 2014 at 1:24pm

waah waah khoob ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 13, 2014 at 10:01am

आ० जितेन्द्र 'गीत' जी ,

उत्साह वर्धन के लिए बहुत धन्यवाद.सादर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 9:49am

मर्मस्पर्शी रचना आदरणीय विजय जी, बधाई स्वीकारें

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 12, 2014 at 10:53am

आ० गोपाल जी, आपके आशीर्वचन पर पुनः नमन.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 10:49am

शर्मा जी

अद्भुत संवेदना i इससे अधिक क्या  कहूं ?

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 12, 2014 at 12:00am

आ० राजेश कुमारी जी,
प्रस्तुत रचना पर आपके उदगार ने रचना के साथ रचनाकार का भी मान बढ़ाया,कोटिश:आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 11, 2014 at 8:00pm

दिल छू गई रचना ....

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