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जमीर कीमती है ,रखते हैं - डा० विजय शंकर

हवा में दम है , उड़ा के ले जाये हमको ,
जम गए हम तो खुद ना हीं हटा करते हैं |

हुकूमत है , हुक्मरान बदलते रहते हैं ,
साथ में हम भी बदलें , यह नहीं करते हैं |

मंहगाई है ,दिन ब दिन बढ़ती रहती है ,
भाव बढ़ा लें अपना ,न , हम नहीं करते हैं |

कमोडिटी नहीं हैं , गायब हैं बाजार से ,
ज़िंदा हैं , खिदमत है दुनियां की, करतें हैं |

जमीर कीमती है , औकात है ,रखते हैं ,
सौदागर हैं , यह तिज़ारत नहीं करते हैं |

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 612

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 5, 2014 at 9:38pm
बहुत अच्छी पकड़ है , रचना सार्थक हुई । बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विजय मिश्र जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 5, 2014 at 9:33pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी।
Comment by विजय मिश्र on July 5, 2014 at 4:38pm
वाह ,गजल का रुआब देखते बनता है और शरीफों के दिल में इसे पढ़ तसल्ली होती होगी , बहुत खुले मिजाज से साफ बात रखी |अनेक बधाई |

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