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अतुकांत ---- तुम , तुम ही न रहे तो क्या बचा ? ( गिरिराज भंडारी )

तुम्हारे फूल अलग रंग के क्यों लग रहे हैं आज

पत्तों का आकार भी बदला बदला सा है

तुम्हारे फूल और पत्ते ऐसे तो उगते न थे

 

पोषण किसी और श्रोत से तो प्राप्त नहीं करने लगे

जड़ या तना बदल तो नहीं लिया है तुमने

बेतुक की बडिंग तो नहीं करवा ली है

किसी और प्रजाति के पौधे से

प्रजातियाँ अच्छी बुरी तो नहीं होतीं  

सभी अपनी जगह ठीक होतीं हैं

पर अपनी, अपनी होती है 

तुक की होती है !

 

बात केवल स्वतंत्रता पर खत्म नहीं होगी

इमानदारी तक भी जा सकती है 

मौलिकता तक तो जाना ही है

 

तुम अब वो रहे ही कहाँ

जड़ें बदल बदल कर क्या से क्या हो चुके हो

उन्नति नहीं कह पा रहा हूँ मै इस परिवर्तन को

वास्तविकता खोने की क़ीमत है ये ?

 

और फिर ,

अगर मै, मै ही नहीं रहा तो क्या रहा ?

तुम , तुम ही न रहे तो क्या बचा ?

         ****************

मौलिक एवँ अप्रकाशित  

 

 

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 10:44pm

प्रिय छोटे भाई, 

स्वयं को अति आधुनिक कहलाने के चक्कर में आज की नकलची युवा पीढ़ी और उन्हें बढ़ावा देने वाले अभिभावकों  की सोच और उनकी खिचड़ी संस्कृति पर करारा कटाक्ष । हालाकि बाद में वही लोग तन मन की पीड़ा भोगते और पछताते भी हैं लेकिन तब तक बहुत  देर हो चुकी होती है। 

कड़वी सच्चाई की हार्दिक बधाई  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 12, 2014 at 9:49pm

वाह क्या बात है बहुत खूब भावनाओं को बहुत उन्नत एवं प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया है आपने बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 7:41pm

आदरणीय विजय भाई , विचारों के अनुमोदन के लिये आपका दिली शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 7:40pm

आदरणीय जगदीश भाई , आपकी प्रतिक्रिया ने मेरी रचना का मान बढ़ा दिया । आपकी सराहना के लिये हार्दिक आभार ॥

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 12, 2014 at 5:52pm

जड़ से जुदा हो रहे आज के युवाओं के लिए जरूरी सन्देश दिया है आपने आ० गिरिराज भाई , बहुत बधाई.

Comment by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on July 12, 2014 at 5:43pm

''तुम अब वो रहे ही कहाँ

जड़ें बदल बदल कर क्या से क्या हो चुके हो

उन्नति नहीं कह पा रहा हूँ मै इस परिवर्तन को

वास्तविकता खोने की क़ीमत है ये ?''

वास्तविकता खोने की कीमत पर तथाकथित उन्नति विकास नहीं हो सकती। जहाँ अपनी पहचान ही न हो वह पतन ही कहलायेगा। एक सही विषय को शब्द देने के लिए बधाई ,भाई गिरिराज भंडारी जी। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 3:41pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , मै हमेशा आपके आस पास ही हूँ , आपका स्नेह मिला ! रचना की सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 2:37pm

अद्भुत, अनिवर्चनीय , कहाँ हो मित्र  तुम्हारे हाथ चूम लूं  i

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