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ग़ज़ल-निलेश "नूर"-न कोई कशिश है न कोई में ख़ला है

१२२/१२२/१२२/१२२
.
न कोई कशिश है न कोई ख़ला है,
ये दिल बावला था ये दिल बावला है.
.

गुनहगार ग़ैरों को क्यूँ कर कहें हम,
वो थे लोग अपने जिन्होंने छला है.   
.

टटोला कई बार ख़ुद को तो पाया, 
जहाँ धडकने थीं वहाँ आबला है.....  आबला- छाला 
.

चढ़ा था नज़र में, जिगर तक न पहुँचा,
नज़र से जिगर तक बड़ा फ़ासला है.         
.

उठाऊंगा मुद्दा क़यामत के दिन ये,
मेरे हक़ का हर फ़ैसला क्यूँ टला है.  

.

समझना है मुश्किल हुआ क्या अचानक,
यहाँ जिस्म रख कर किधर वो चला है.
.

जिसे ले गए सब, वो था ‘नूर’ जैसा,
कोई तो बताए कि क्या मामला है.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 693

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 9, 2014 at 12:45pm

शुक्रिया सर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 3:12am

मतले ने ही जादू कर दिया.. फिर तो आगे शेर उसी बहाव में सधते चलेगये..  वाह !

बधाई आदरणीय.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:41am

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:41am

शुक्रिया आ. चंद्रशेखर जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:41am

शुक्रिया आ. आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:40am

शुक्रिया आ. जवाहर जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:40am

शुक्रिया आ. हेमंत जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:40am

शुक्रिया आ. जीतेन्द्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 18, 2014 at 7:39am
बहुत बहुत धन्यवाद आ. गिरिराज जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 12:08pm

चढ़ा था नज़र मेंए जिगर तक न पहुँचाए
नज़र से जिगर तक बड़ा फ़ासला है........       बहुत लाजवाब शेर
उठाऊंगा मुद्दा क़यामत के दिन येए
मेरे हक़ का हर फ़ैसला क्यूँ टला है .......... वाह क्या बात कही हम भी आपके साथ खड़े हैं
समझना है मुश्किल हुआ क्या अचानकए
यहाँ जिस्म रख कर किधर वो चला है.....क्या खूब कहा

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