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" अरे..! आओ बेटा रजनी, और सुनाओ कैसी  हो..? . बड़े दिनों बाद आना हुआ..  अरे हाँ तुमने अपने बेटे , बिट्टू को नही लाई. वो वहां तुम्हारे बिन रोयेगा तो.." राधेश्याम जी ने अखबार के पन्नो की घड़ी करते हुए कहा

" प्रणाम चाचाजी....सब कुछ कुशल है..    बिट्टू  तो बहुत परेशान करने लगा था , दिन भर मम्मी मम्मी ..!! .  मैंने उसे टेलीविजन का ऐसा शौक लगाया है की, उसे मेरी बिलकुल भी जरुरत नहीं. शाम तक आराम से जाउंगी.."   रजनी ने बड़ी चैन की सांस लेते हुए कहा

      

    

      जितेन्द्र 'गीत'

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 22, 2014 at 1:10am

आपकी शुभकामनायें  शिरोधार्य है आदरणीय सौरभ जी, अपना स्नेह व् मार्गदर्शन बनाये रखियेगा

सादर !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 12:21am

बढ़िया विन्दु पकड़ा आपने, भाई जी .. लघुकथा के लिए शुभकामनाएँ 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 20, 2014 at 9:26pm

रचना पर आपकी सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ, आदरणीया मीना दीदी. स्नेह बनाये रखियेगा 

सादर!

Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 6:08pm

सुन्दर ..सार्थक सन्देश देती लघुकथा हेतु बधाई प्रिय जितेन्द्र जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 20, 2014 at 10:30am

रचना पर आपकी उपस्थिति व् प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ , आदरणीय संतलाल जी

सादर!

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 8:23am

आदरणीय जितेन्द्र गीत जी,

 व्यंग्यपरक, किन्तु वर्तमान जीवनगत विसंगति के प्रति सन्देश देती अच्छी लघु कथा,  साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 18, 2014 at 11:53pm

आपका ह्रदय से आभार , आदरणीया कल्पना दीदी

सादर!

Comment by kalpna mishra bajpai on July 18, 2014 at 10:20pm

बिलकुल सही कहा आप ने । बहुत बधाई /सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 18, 2014 at 1:02pm

आपका कहना बिलकुल सही है आदरणीय शुभ्रांशु जी. एक छोटी सी आदत है जो लग गई सो लग गई,   खैर..  वो तो मासूम बच्चे है हम अपने आप को ही देख लें, हम भी कहीं किन्ही आदतो में इतने व्यस्त हो जाते है कि कभी कोई आवाज भी दे तो सुनाई नहीं पड़ती और बहुत सी बातें भूल भी जाते हैं :-))))

रचनाओं पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बहुत ख़ुशी व् मनोबल मिलता  है , अपना स्नेह बनाये रखियेगा
सादर !

Comment by Shubhranshu Pandey on July 18, 2014 at 10:28am

आदरणीय जितेंद्र जी, 

आदत बहुत छोटी सी है लेकिन अब लगा दी गयी तो लग गयी...

ये घर घर की समस्या है...कभी ये आदत घर का काम समेटने के लिये लगायी जाती है. कभी...बस एक दो सीरियल ही तो देखते हैं, कह कर लगाई जाती है....कभी न्युज और कभी मैच के नाम पर लेकिन ये बुद्धु बक्से कि आदत लगाते हम ही हैं..

सुन्दर कथा....बधाई..

सादर.

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