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धूप, दीप, नैवेद बिन, आया तेरे द्वार

भाव-शब्द अर्पित करूँ, माता हो स्वीकार

 

उथला-छिछला ज्ञान यह, दंभ बढ़ाए रोज

कुंठाओं की अग्नि में, भस्म हुआ सब ओज

 

चलते-चलते हम कहाँ, पहुँच गए हैं आज

ऊसर सी धरती मिली, टूटे-बिखरे साज

 

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल

काई से भरने लगा, संबंधों का ताल

 

नयनों के संवाद पर, बढ़ा ह्रदय का नाद

अधरों पर अंकित हुआ, अधरों का अनुनाद

 

तेरे-मेरे प्रेम का, अजब रहा संयोग

नयनों ने गाथा रची, नयनन योग-वियोग

 

जटिल सभी अभिप्राय हैं, क्लिष्ट हुए सब शब्द

जड़ होती संवेदना, अवमूल्यन प्रत्यब्द  

 

लहर-लहर हर भाव है, भँवर हुआ अब दंभ

विह्वल सा मन ढूँढता, रज-कण में वैदंभ 

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Comment by vijay nikore on July 27, 2014 at 5:48pm

भावपूर्ण सुन्दर दोहों के लिए बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 1:19am

धूप, दीप, नैवेद बिन, आया तेरे द्वार
भाव-शब्द अर्पित करूँ, माता हो स्वीकार .. .. . वाह वाह !! न जानामि योगं जपं नैव पूजां  का सुन्दर प्रयोग किया गया है इन पदों में...

उथला-छिछला ज्ञान यह, दंभ बढ़ाए रोज
कुंठाओं की अग्नि में, भस्म हुआ सब ओज .. . सही तथ्य आकार पा गया है. हार्दिक बधाई इस उच्च संप्रेषणीयता पर आदरणीय बृजेशजी.. .

चलते-चलते हम कहाँ, पहुँच गए हैं आज
ऊसर सी धरती मिली, टूटे-बिखरे साज.. .. . ..  निवेदन हेतु कुछ विन्दु हैं यहाँ, परन्तु, अतिशय का स्वर अधिक मुखर है. समस्त पाठकों की भावनाएँ सम्माननीय हैं.

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल
काई से भरने लगा, संबंधों का ताल.. . .. ..     अत्यंत सराहनीय प्रयास हुआ है, आदरणीय. अंतर्निहित भावों का विन्दुवत संप्रेषण वस्तुतः मुग्धकारी है. वैसे, प्रयुक्त बिम्ब-शब्दों के सापेक्ष काई  का कदली शब्द स्वरूप कहीं अधिक सटीक होता. किन्तु, ऐसा करना अनिवार्य नहीं. किसी पाठक के मन में ऐसे शाब्दिक विचार आते रहते हैं.  

नयनों के संवाद पर, बढ़ा ह्रदय का नाद.. .... .. आप तो अक्षरी के प्रति बहुत ही आग्रही रहे हैं. हृदय ही लिखा करें.
अधरों पर अंकित हुआ, अधरों का अनुनाद.. .. . वाह ! वाह !!  वाह !!! .. यदि निवेदन करूँ, तो तुकान्तता का यही विन्दु प्रश्नों की सीमाओं में है. जिसकी चर्चा आप कर रहे हैं. इन छन्दों की भाषा ’चलताऊ’ नहीं है. अतः, आगे, आपको ही मान्य करना होगा. आदरणीय, आप एक विचार-समृद्ध संप्रेषक हैं.

तेरे-मेरे प्रेम का, अजब रहा संयोग
नयनों ने गाथा रची, नयनन योग-वियोग ... ....... . अरे वाह ! .. बहुत बढिया !!

जटिल सभी अभिप्राय हैं, क्लिष्ट हुए सब शब्द ... . कृपया प्रथम चरण अवश्य देख लें.
जड़ होती संवेदना, अवमूल्यन प्रत्यब्द  ................इस अभिव्यक्ति पर सादर बधाइयाँ ! प्रत्यब्द शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है !

लहर-लहर हर भाव है, भँवर हुआ अब दंभ
विह्वल सा मन ढूँढता, रज-कण में वैदंभ ................रज-कण में वैदम्भ ! वाह ! बहुत सुन्दर ! सर्वव्यापी विष्णुभाव को जिष्णुवत देखने का आग्रह उच्च मनोदशा का परिचायक है. वैसे तुकान्तता के आलोक में कहूँ, तो इस छन्द की भाषा भी अत्यंत संयमित और सुसंस्कृत है. अतः देख लेंगे.

इन सार्थक दोहों के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें, आदरणीय बृजेश जी.

ऐसे भाव-कथ्यों से पगी प्रस्तुतियों का सदा-सदा से स्वागत रहा है, और रहेगा.
सादर

Comment by बृजेश नीरज on July 21, 2014 at 8:36am

अप सभी सुधी जनों का हार्दिक आभार! आप सभी के उत्साहवर्धन से बल मिला! 

Comment by mrs manjari pandey on July 20, 2014 at 7:26pm
मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल
काई से भरने लगा, संबंधों का ताल

तेरे-मेरे प्रेम का, अजब रहा संयोग
नयनों ने गाथा रची, नयनन योग-वियोग

आदरणीय बृजेश नीरज जी बहुत ही सुन्दर दोहे। जैसे दिल के पट खोल रहे हैं। हार्दिक बधाई
Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 6:10pm

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल
काई से भरने लगा, संबंधों का ताल.................लाजवाब दोहे //// सादर बधाई 

 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 20, 2014 at 3:40pm

अच्छे दोहे हैं बृजेश जी। ये वाला विशेष

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल
काई से भरने लगा, संबंधों का ताल

दाद कुबूलें

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:28pm

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल
काई से भरने लगा, संबंधों का ताल///वाह वाह

जटिल सभी अभिप्राय हैं =१३ मात्रा ही है
आदरणीय भाई बृजेश जी इन अनुपम दोहों के लिए बहुत बहुत बधाई। ………।सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 20, 2014 at 11:19am

सुन्दर और मन मुग्ध करते सार्थक दोहे रचने के लिए अत्शय बधाईयाँ श्री बृजेश नीरज जी 

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 7:34am

आदरणीय बृजेश नीरज जी,

अत्यंत सधे हुए दोहे, खड़ी बोली में, सारगर्भित और व्यापक अर्थ के साथ; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by बृजेश नीरज on July 19, 2014 at 9:52pm

आदरणीय जवाहर जी आपका हार्दिक आभार!

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