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इक ज़माना हो जाता है …

इक ज़माना हो जाता है …

आदमी
कितना छोटा हो जाता है
जब वो पहाड़ की
ऊंचाई को छू जाता है
हर शै उसे
बौनी नज़र आती है
मगर
पाँव से ज़मीं
दूर हो जाती है
उसके कहकहे
तन्हा हो जाते हैं
लफ्ज़ हवाओं में खो जाते हैं
हर अपना बेगाना हो जाता है
ऊंचाई पर उसकी जीत
अक्सर हार जाती है
वो बुलंदी पर होकर भी
खुद से अंजाना हो जाता है
ज़मी के बशर तो
ज़मीं पर ज़िंदा रहते हैं मगर
ज़मीं के वास्ते वो
इक ज़माना हो जाता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 608

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 29, 2014 at 7:44pm

आदरणीय विजय निकोरे   जी रचना के भावों पर आपकी  स्वीकृति ने उसका जो मान बढ़ाया है उसके लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 29, 2014 at 7:43pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय  जी रचना के भावों का आपकी आत्मीय स्वीकृति ने उसका जो मान बढ़ाया है उसके लिए मैं तहेदिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ। 

Comment by Sushil Sarna on July 29, 2014 at 7:41pm

आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा  जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 29, 2014 at 7:40pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी रचना पर आपकी मधुर प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by vijay nikore on July 29, 2014 at 1:21pm

रचना के भाव बहुत अच्छे लगे। बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 28, 2014 at 10:14pm

आपकी यह कविता कई-कई तह में सिमटी हुई धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलने लगती है, आदरणीय सुशीलभाईजी. पंक्तियों के साथ नहीं, समाप्त होने के बाद. ऐसा बहुत कम होता है. लेकिन जब होता है कविता जीती हुई दिखती है.
प्रस्तुति से मन प्रसन्न है.


बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, आदरणीय.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 3:56pm

आदरणीय शुशील जी ..इस अद्भुत चिंतन के लिए आपको तहे दिल बधाई ..आपकी रचना को महसूस किया जा सकता है ..बेहतरीन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 28, 2014 at 11:43am

आदरणीय सुधील भाई , जीवन की एक कटु सत्य को आपने शब्द दिये हैं , सच है चोटी पर पहुँच कर आदमी अकेला हो जाता है , वैसे भी चोटी पर तो एक ही रह सकता है । कविता के लिये बधाइयाँ

Comment by Sushil Sarna on July 27, 2014 at 2:47pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर  जी रचना के भावों को आपकी स्वीकृति ने सृजनकर्ता को जो ऊर्जा दी है उसका हार्दिक आभार 

Comment by Sushil Sarna on July 27, 2014 at 2:46pm

आदरणीय गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी रचना के भावों को स्वीकृति देती अभिव्यक्ति का हार्दिक आभार 

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