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"अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है ? जल्दी लाओ , यहाँ ख़त्म हो गयी |"

बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए | कई पंगतों में लोग बैठ कर भोजन कर रहे थे , काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर | सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे | थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते , उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था , वो सब उनके बर्तनों में रख लेते थे |
खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे | उसके दिमाग में पिछले कुछ सालों की घटनाएँ घूमने लगीं | माँ एकदम से बीमार पड़ी और उसने बिस्तर पकड़ लिया | बड़ा बेटा विदेश में था , छोटे के साथ ही रहते थे दोनों | खाने के नाम पर पतली खिचड़ी मिल जाती थी माँ को , लेकिन शायद बुढ़ापे में इच्छाएं और जोर मारने लगती हैं , माँ की भी इच्छा होती थी कि वो कुछ चटपटा खाए , पनीर तो बहुत प्रिय था उसे | एक आध बार कहा भी उसने कि पनीर खाने का मन है लेकिन वो कह नहीं पाये बहु से |
अचानक वो उठे , धीरे से एक पनीर का डोंगा उठाया और ले जाकर उन ज़मीन पे बैठे लोगों को दे दिया | उन लोगों की ख़ुशी का पारावार नहीं था और बाबूजी ने एक नज़र आसमान की ओर देखा और उनकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े |

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 29, 2014 at 1:17pm

आभार मनीष जी ..

Comment by maneesh dixit on August 28, 2014 at 12:01pm

सचेत करती है यह भावपुर्ण कथा मुझे अपने कर्तव्यो के प्रति. नमन आपको.

Comment by विनय कुमार on August 4, 2014 at 1:50am

आभार सौरभजी , आपका स्नेह मिला , धन्यवाद..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 1:10am

परम्पराओं और उनके निर्वहन में मात्र प्रक्रिया नहीं आदमी की भावनाएँ बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं. उन भावनाओं को शाब्दिक करती एक अच्छी लघुकथा से गुजरना हुआ है. आदरणीय विनयजी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ.

 

Comment by विनय कुमार on August 1, 2014 at 9:33pm

आभार सुभ्रांशुजी..

Comment by Shubhranshu Pandey on August 1, 2014 at 6:21pm

आदरणीय विनय जी सुन्दर कथा. बधाई .

सादर.

Comment by विनय कुमार on July 30, 2014 at 6:56pm

आभार सविता मिश्राजी..

Comment by savitamishra on July 30, 2014 at 3:03pm

बहुत मार्मिक कहानी

Comment by विनय कुमार on July 30, 2014 at 2:58pm

आभार डॉ गोपाल नारायण जी..

Comment by विनय कुमार on July 30, 2014 at 2:58pm

आभार कुन्ती मुखर्जी जी..बूढी काकी श्री प्रेमचंद जी की अनुपम कृति है , आपको दिल से धन्यवाद..  

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