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आज अचानक बेटा अपने बीबी बच्चों सहित गांव पंहुचा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । कहाँ तो बुलाने पे भी कोई न कोई बहाना बना देता था और अगर आया भी तो अकेला और उसी दिन वापस ।

" दादा , दादी के पैर छुओ बच्चों" , और बहू ने भी झुक के पैर छुए दोनों के । फिर बहू ने लाड़ दिखाते हुए कहा " क्या बाबूजी , आप कितने दुबले हो गए हैं , लगता है माँ आपका ध्यान नहीं रख पाती , अब आप लोग हमारे साथ ही चल कर रहिये" ।

"हाँ , हाँ , क्यों नहीं , बिलकुल अब आप लोग चलिए हमारे साथ , क्या रखा है अब यहाँ" , बेटा भी कहने लगा और माँ के पास बैठ गया ।

ये क्या हो गया है इनको , इतना परिवर्तन कैसे हो गया , समझ नहीं पा रहे थे बाबूजी कि अचानक अख़बार की खबर का ध्यान आ गया । उसके गाँव के बगल से बाईपास निकल रहा था और अब वहाँ की जमीनों के दाम कई गुना बढ़ गए थे ।  

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 1, 2014 at 9:32pm

आभार सौरभजी | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 1, 2014 at 5:54pm

यह लघुकथा चुभती हुई मगर एक सच्चाई है. यह सच्चई जाने कितने गाँवों में कितने ही रूपों घटी है, या घटती रही है.

आपकी पारखी दृष्टि के लिए हृदय से शुभकामनाएँ.  कथा वस्तुतः सोचने को मज़बूर देती है. शुभ-शुभ

Comment by विनय कुमार on July 29, 2014 at 5:20pm

आभार आमोद कुमारजी एवम शुभ्रांशु पाण्डेयजी..

Comment by Shubhranshu Pandey on July 29, 2014 at 10:31am

आदरणीय विनय जी, 

गांव की जमीन आज फ़िर बुला रही है लेकिन आने का उद्देश्य बदल गया है..सुन्दर कथा.

सादर.

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 29, 2014 at 8:30am

एक पुराने बरगद की जिसकी सभी टहनियाँ लोग काट काट के ले गए ... और जो सबको अपनी छांव से सहारा देता था ... उसके ताने को भी काटने को आतुर .... उस बूढ़े बरगद की  व्यथा को दर्शाने के लिए बधाई स्वीकार करें ... सादर ... 

Comment by विनय कुमार on July 28, 2014 at 6:42pm

आभार डॉ विजय शंकरजी एवम डॉ आशुतोष मिश्रजी..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 4:45pm

कलियुगी दास्तान का बखूबी चित्रण किया है आपने ..सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 28, 2014 at 2:32pm
चलो बाईपास से ही सही , सही रास्ता तो नज़र आया और माँ बाप का ख्याल आया।
अच्छा है , बधाई।
Comment by विनय कुमार on July 28, 2014 at 1:06pm

आभार डॉ गोपाल नारायणजी..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 28, 2014 at 11:15am

वही शाश्वत व्यथा  i नए अंदाज में  i

क्या कभी मानसिकता बदलेगी i ---- सादर i

कृपया ध्यान दे...

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