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2122 212 212 2212

 

हम लिखेंगे ओ सनम इक कहानी प्यार की । । 

दास्ताँ कोई बनेगी ज़िंदगानी प्यार की ।

लाख सदियों से पुराना प्यार फिर भी है नया ,
हर जवाँ दिल में धड़कती है जवानी प्यार की ।

तू खिजां से दोस्ती कर पतझड़ों में रंग भर  ,
एक दिन आकर रहेगी ऋतु सुहानी प्यार की ।

ये जुबां वालों  कि दुनिया में न हाले दिल सुना ,
कब भला समझी किसी ने बेज़ुबानी प्यार की ।

ये सभी रस्में व कसमें सब रिवाज़ों से परे ,
एक हमको है रसम ही बस निभानी प्यार की ।

इम्तहाँ देने पड़ेंगे हर कदम पर सब्र के ,

तुम समझ लेना इसे महरबानी प्यार की ।

ज़िन्दगी के दायरे में हम रहें या ना रहें ,
छोड़ जाएंगे जहाँ में  इक निशानी प्यार की ।

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज मिश्रा

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Comment

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Comment by Neeraj Nishchal on August 11, 2014 at 12:16pm

आदरणीय सौरभ जी आप के कहे अनुसार मैंने कुछ संशोधन करने के प्रयास की ये हैं कृपया देखें और पुनः अवगत कराएं

आपके सुझावों के लिए व प्रस्तुति पर आने के लिए आप का सहृदय आभार ।

Comment by Neeraj Nishchal on August 11, 2014 at 12:14pm

आदरणीय नरेंद्र जी बहुत बहुत धन्यवाद । 

Comment by Neeraj Nishchal on August 11, 2014 at 12:09pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी आपका बहुत बहुत आभार । 

Comment by Neeraj Nishchal on August 10, 2014 at 10:15am
आदरणीया मीना जी बहुत बहुत शुक्रिया ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 1:28am

गज़ल के कई मिसरे आप द्वारा उद्धृत वज़न के अनुरूप नहीं हैं. हो सके तो कृपया एक दफ़े और तक्तीह कर लें.

मैं ग़ज़ल की प्रस्तुति में ग़ज़ल ही चाहता हूँ. यानि अरुज़ के नियमों के अन्तर्गत प्रयास हुआ हो.

शुभेच्छाएँ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 8, 2014 at 12:38pm

नीरज जी

गजल का शिल्प मै अधिक नहीं जानता i मगर आपकी रचना की रवानी और उसका कथ्य बेमिसाल है i मेरी तरफ से आपको बहुत बधाई i

Comment by Meena Pathak on August 8, 2014 at 12:23pm

बहुत सुन्दर 

कृपया ध्यान दे...

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