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किससे क्‍या है शिकवा

किसको क्‍या शाबाशी।

नहीं कम हुए बढ़ते

दुष्‍कर्मों को पढ़ते

बेटे को माँ बापों पर

अहसाँ को गढ़ते

नेता तल्‍ख़ सवालों पर

बस हँसते-बचते

देख रहे गरीब-अमीर

की खाई बढ़ते

कितनी मन्‍नत माँगे

घूमें काबा काशी।

 

फि‍र जाग्रति का

बिगुल बजेगा जाने कौन

फि‍र उन्‍नति का

सूर्य उगेगा जाने कौन

आएगी कब घटा

घनेरी बरसेगा सुख,

फि‍र संस्‍कृति की

हवा बहेगी जाने कौन

स्‍वप्‍न नहीं यह

अभिलषा के कुसुमाकाशी।

 

छोड़ेंगे यदि

संस्‍कार होंगे बेहतर कब

पालेंगे यदि

बहिष्‍कार होगें कमतर कब

रिश्‍तों की गरमाहट को

लग गई नज़र कब,

भूलेंगे यदि

परिष्‍कार होंगे बरतर कब

कैसे बदले हवा

फूल कब हों पालाशी।

*मौलिक एवं अप्रकाशित*

 

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Comment

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Comment by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 27, 2014 at 8:24am

आभार पवन कुमारजी एवं लक्ष्‍मण धामीजी ।

Comment by Pawan Kumar on August 25, 2014 at 2:28pm

आदरणीय डा0 गोपाल कृष्ण जी सादर प्रणाम.....
इस सुन्दर रचना में बहुत कुछ है, घर है, बाहर है, वर्तमान है, भविष्य है, व्यंग है, सीख है... सबकुछ है .... अच्छा लगा
सादर बधाई.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 25, 2014 at 11:15am

आदरणीय भाई गोपाल किशन भट जी यथार्थ को बयां करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई।

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