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न होना दूर नज़रों से कसम हमको खिलाती थी
न दे जब साथ लब उसके इशारो से बुलाती थी

किताबों में छुपाती थी दिया हमने जो दिल उसको
बचा नज़रे सभी की वो उसे दिल से लगाती थी

चुरा नज़रे सभी की हम मिले जब बाग में इक दिन
लगा कर वो गले हमको बढ़ी धड़कन सुनाती थी

कभी आँखों मे डाले अाँख कर देता शरारत तो
चुरा कर वो नज़र हमसे जरा सा मुस्‍कुराती थी

न भूलेगे कभी हम तो बिताये साथ पल उसके
छुपा कर चाँद सा मुखड़ा हमें हरदम सताती थी

मौलिक एवं अप्रकाशित

अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by शकील समर on September 10, 2014 at 3:45am

जी हां, इस बदलाव से ये गजल काफिए के स्तर पर दुरुस्त हो जाएगी।

Comment by Akhand Gahmari on September 10, 2014 at 12:26am

अादरणीय गुरूवर गिरिराज भंडारी जी आपको चरण स्‍पर्श आप सर्मथन नहीं आदेश करें।

Comment by Akhand Gahmari on September 10, 2014 at 12:25am

आदरणीय शकील समर जी आप जैसे मार्गदर्शक की वजह से आज हम सीख पाये है और सीख पा रहे है मार्गदर्शन के लिये आपको नमन जहॉं तक बदलवा की बात है मैने ये बदलाव किया है क्‍या इससे समस्‍या हल हो जायेगी

न होना दूर नज़रों से कसम हमको खिलाती थी
सजा दो मॉंग अब मेरी इशारो से बताती थी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2014 at 8:39pm

आदरणीय अखंड भाई , ग़ज़ल की बातें बहुत खूब सूरत लगीं , काफिये में गड़बड़ी है , आदरणीय शकील भाई के कहे का मैं भी समर्थन करता हूँ , सुदार लीजिये गा | प्रयास के लिए बधाइयाँ |

Comment by शकील समर on September 9, 2014 at 4:27pm

आदरणीय अखंड गमहरी साहब,
आपकी ये गजल काफिए के स्तर पर खारिज हो रही है। मतले में आपने वकाफी 'खिलाती' और 'बुलाती' लिया है। मेरी जानकारी के अनुसार इसमें इकवा दोष है। अगर क्षण भर के लिए इकवा दोष को नजरअंदाज भी कर दिया जाए तो शेष अशआर के काफिये भी खारिज हो रहे हैं। क्योंकि किसी में भी 'लाती' को नहीं निभाया गया है। सादर।

Comment by ram shiromani pathak on September 8, 2014 at 11:06am
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय अखंड भाई।। बहुत बहुत बधाई आपको।। सादर
Comment by Akhand Gahmari on September 7, 2014 at 9:33pm

हम आपके मार्गदर्शन एवं उत्‍साहवर्धन्‍ा के सदैव आकांक्षी है मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें आदरणीय harivallabh sharma जी

Comment by Akhand Gahmari on September 7, 2014 at 9:33pm

हम आपके मार्गदर्शन एवं उत्‍साहवर्धन्‍ा के सदैव आकांक्षी है मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें आदरणीय Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' जी

Comment by harivallabh sharma on September 7, 2014 at 9:29pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल..
किताबों में छुपाती थी दिया हमने जो दिल उसको 
बचा नज़रे सभी की वो उसे दिल से लगाती थी..सभी अशआर लाजबाब ..बधाई आपको.

Comment by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 7, 2014 at 8:39pm

बहुत सुंदर शृंगारित भाव। 

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