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अब भी चेतो मानव मन तू!

कल कल कल कल नदियाँ बहती, झरने गीत सुनाते हैं,

तरु शाखाओं पर छिपकर खग, पंचम सुर में गाते हैं.

गिरि, नद, जंगल, अवनि, पशु सब, सृष्टि के अनमोल रतन,

मानव सबसे बुद्धि शील बन, अपनी राह बनाते हैं.

नदियों की धारा को रोकी, शिखरों को भी ध्वस्त किया,

काटके जंगल, भवन बनाते, अब क्यों वे पछताते हैं.

सीख नहीं कुछ लेते मानव, प्रकृति सब कुछ देख रही,

कभी केदार, कभी कश्मीर में, मानव ही दुःख पाते हैं.  

सेना सीमा की रक्षक है, आपद में करती सेवा,

सरकारें लाचार हुई जब, सेना के गुण गाते हैं.

अब भी चेतो मानव मन तू, सृष्टि का सम्मान करो,

साथ रहो सब हिलमिलकर ही, दुनियां नयी बसाते हैं.    

*********  

(मौलिक व अप्रकाशित)

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर  

 

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 21, 2014 at 3:13pm

आदरणीय श्री संतलाल करुण जी, सादर अभिवादन!

उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 21, 2014 at 3:12pm

आदरणीय श्री पवन कुमार जी, सादर अभिवादन!

प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 21, 2014 at 3:12pm

आदरणीय श्री श्याम नारायण वर्मा जी, सादर अभिवादन!

प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 21, 2014 at 3:11pm

आदरणीय श्री गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, सादर अभिवादन!

उत्साह वर्धन  के लिए हार्दिक आभार!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 21, 2014 at 3:09pm

आदरणीय श्री विजय शंकर जी, सादर अभिवादन!

प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार!

Comment by Santlal Karun on September 15, 2014 at 9:51pm

आदरणीय जवाहर जी ,

सामयिक और ज्वलंत विषय पर आप ने तात्कालिक विचार प्रधान रचना दी है --

"ना सीमा की रक्षक है, आपद में करती सेवा,

सरकारें लाचार हुई जब, सेना के गुण गाते हैं.

अब भी चेतो मानव मन तू, सृष्टि का सम्मान करो,

साथ रहो सब हिलमिलकर ही, दुनियां नयी बसाते हैं."

...हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by Pawan Kumar on September 14, 2014 at 3:13pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... सादर बधाई !

Comment by Shyam Narain Verma on September 13, 2014 at 10:05am
" सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये आपको बधाइयाँ .................. "
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 12, 2014 at 11:20am

जवाहर जी

आपकी कविता प्रासंगिक है i

सीख नहीं कुछ लेते मानव, प्रकृति सब कुछ देख रही,

कभी केदार, कभी कश्मीर में, मानव ही दुःख पाते हैं.

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 11, 2014 at 7:10pm
अब भी चेतो मानव मन तू, सृष्टि का सम्मान करो,
साथ रहो सब हिलमिलकर ही, दुनियां नयी बसाते हैं.
सार्थक , सुन्दर। बहुत बहुत बधाई आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी .

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