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ग़ज़ल- दर्द जब पत्थर को सुनाता था......सूबे सिंह सुजान

 दर्द पत्थर को जब सुनाता था

मुझको पत्थर और आजमाता था।

बोलना,उसके सामने जाकर,

मैं तो अन्दर से काँप जाता था

वो समझता न था,मेरे अहसास,

मैं तो मिट्टी पे लेट जाता था

इतनी पूजा की विधि थी उसके पास,

हर किसी को वो लूट जाता था

आज मालूम हो गया मुझको,

एक पुतला मुझे डराता था।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by harivallabh sharma on September 21, 2014 at 2:08pm

बहुत सुन्दर आदरणीय..

 दर्द पत्थर को जब सुनाता था

मुझको पत्थर और आजमाता था।..अच्छी ग़ज़ल बधाई.

Comment by सूबे सिंह सुजान on September 20, 2014 at 7:34pm

 जितेन्द्र 'गीत'  ,

                    जी आपका हृादिक स्वागत है। बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 20, 2014 at 8:41am

आज मालूम हो गया मुझको,

एक पुतला मुझे डराता था.......बहुत सुंदर. बधाई आपको आदरणीय सूबे सिंह जी

Comment by सूबे सिंह सुजान on September 18, 2014 at 8:39pm

Sulabh Agnihotri..............जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by Sulabh Agnihotri on September 18, 2014 at 3:34pm

आज मालूम हो गया मुझको,

एक पुतला मुझे डराता था।

वाह ! बहुत सुन्दर गजल हुई है भाई सूबे सुजान सिंह जी !

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