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चूड़ियाँ

एक दिन
कॉफी हाउस में
दिखा
कलाई से कोहनी तक
कांच की चूड़ियों से भरा
हीरे के कंगन मढ़ा
एक खूबसूरत हाथ.
गूँज रही थी
उसकी हंसी चूड़ियों के
हर खनक के साथ.
फिर एक दिन
दिखा वही हाथ
कलाईयाँ सूनी थीं
चूड़ियों का कोई निशान
तक नहीं था
सूनी संदल सी
उस कलाई
के साथ
जुडी थी एक
खामोशी .
देर तक सोंचता रहा
क्या चूड़ियाँ
चार दिन की चांदनी
होती हैं.?
मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा

Views: 740

Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 24, 2014 at 9:37am

बहुत आभार आ ० रमेश कुमार चौहान जी.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 24, 2014 at 9:37am

बहुत आभार जनाब खुर्शीद खैराड़ी जी.

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 23, 2014 at 10:23pm

सुंदर चित्रण

Comment by khursheed khairadi on September 23, 2014 at 10:26am

सूनी संदल सी 
उस कलाई
के साथ 
जुडी थी एक 
खामोशी .

आदरणीय विजय प्रकाश शरमा जी अच्छा बिम्ब है |सादर अभिनन्दन 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 21, 2014 at 11:21pm

आभार आ ० गिरिराज भाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 21, 2014 at 9:58pm

बहुत खूब आदरणीय , चूड़ी ही क्यों सब कुछ चार दिन का ही खेल है | बढ़िया बात कही आदरणीय ,बधाइयाँ |

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 21, 2014 at 1:40pm

श्री जीतेन्द्र जी,
रचना की सराहना के लिए बहुत आभार.स्नेह बनाये रखें.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 21, 2014 at 1:39pm

डॉ. विजय शंकर जी,
आपकी सराहना ऊर्जा का संचार कर देती है.बहुत आभार

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 21, 2014 at 1:22pm

बहुत सामान्य सी पंक्तियाँ, बहुत गहरी उतर गई मन में. प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीय विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 21, 2014 at 1:17pm
हाँ , शायद चूड़ियाँ चांदनी की, खुशी की प्रतीक होती हैं . संवेदनाओं से भरी इस रचना के लिए बधाई आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी .

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