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अरे चाचा !

तुम तो बिलकुल ही बदल गये

मैंने कहा – ‘ तुम्हे याद है बिरजू 

यहाँ मेरे घर के सामने

बड़ा सा मैदान था 

और बीच में एक कुआं 

जहाँ गाँव के लोग

पानी भरने आते थे 

सामने जल से भरा ताल 

और माता भवानी का चबूतरा

चबूतरे के बीच में विशाल बरगद

ताल की बगल में पगडंडी

पगडंडी के दूसरी ओर

घर की लम्बी चार दीवारी

आगे नान्हक चाचा का आफर

उसके एक सिरे पर

खजूर के दो पेड़ 

पेड़ो के पास से गुजरता

धूल भरा गलियारा

गलियारे के किनारे

पिलुआ के हरियाले पेड़ 

दूसरी ओर राधे दादा के खेत 

पिलुआ पर बैठे दो-चार बच्चे

कूदते-फुदकते

एक डाल से दूसरी डाल पर

शोर मचाते लड़ते

ऊसर में ख़त्म होता वह

सर्पाकार गलियारा

उस ठौर जलती थी

गाँव की होली

झांकता था दूर से

लसोढ़े का पेड़  

बरसते मेह में

सुलगती थी उसकी गंध 

आज ये सब कहाँ है ?

पेड़ो को लील लिया

समय की मार ने

गलियारों को अतिक्रमण ने

मैदानों को बढ़ती बस्ती ने  

सभी कुछ तो बदल गया 

तुम भी वही है 

मै भी वही हूँ

गाँव भी वही है

पर न तुम, न मैं

और न गाँव 

कोई भी पहले जैसे नहीं हैं

सब कुछ बदलता है

सब कुछ बदला है

मिट भी जायेगा

एक दिन !

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 25, 2014 at 9:40pm

जीतू भाई

आपका सादर आभार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 25, 2014 at 2:00pm

सच! वास्तविकता को दिखाती हुई एक सुंदर रचना प्रस्तुति, बधाई आपको आदरणीय डा. गोपाल जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 25, 2014 at 11:29am

पवन कुमार जी

आपका आभार  i सस्नेह i

Comment by Pawan Kumar on September 24, 2014 at 7:09pm
बहुत ही सुन्दर .... मौलिकता के दर्शन से सराबोर .......... अफसोस कि आधुनिकता में सबकुछ बदलता जा रहा है।
आदरणीय .... सादर बधाई !!
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2014 at 12:44pm

आदरणीय  खुर्शीद खैरादी जी

आपके प्रोत्साहन से पुलकित हुआ i सादर आभार i

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2014 at 12:43pm

आदरणीय हरिवल्लभ जी

आपका आभार व्यक्त करता हूँ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2014 at 12:42pm

विजय सर !

आपकी विशद टिप्पणी से संतुष्टि मिली i आपका आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2014 at 12:40pm

आदरणीया छाया शुक्ल जी

आपका शत-शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2014 at 12:39pm
आदरणीय शर्मा जी
आपका आभार एवं अभिनन्दन i
Comment by khursheed khairadi on September 23, 2014 at 10:20am

ऊसर में ख़त्म होता वह

सर्पाकार गलियारा

उस ठौर जलती थी

गाँव की होली

झांकता था दूर से

लसोढ़े का पेड़  

बरसते मेह में

सुलगती थी उसकी गंध 

आदरणीय गोपालनारायण जी ,हार्दिक अभिनन्दन ,बहुत ही मार्मिक चित्रण है |आपके शब्दचित्र से लगभग मिलता हुआ मेरे गाँव का मंज़र है|वही लसोड़े का पेड़ और पके लसोड़ों से लक दक  डालियाँ ,ऐसा लगता था जैसे  भारी  कुंदन जड़ित ज़री की हरी ओढ़नी हो |आपके लेखनी को कोटि प्रणाम |सादर 

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