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ग़ज़ल: जिंदगी जैसे परायी हो गयी.

पाँव में खुद के बिवाई हो गयी.

आदमी तेरी दुहाई हो गयी.

 

वायु पानी भी नहीं हैं शुद्ध अब,

सांस लेने में बुराई हो गयी.

 

बारिशों का दौर सूखा जा रहा.

मौसमों की लो रुषायी हो गयी.

 

आपदाएं रोज़ होतीं हर कहीं,

रुष्ट अब जैसे खुदाई हो गयी.

 

काट डाले पेड़ सब मासूम से,

जंगलों की तो सफाई हो गयी.

 

काटती है पैर खुद अपने भला,

देखिये आरी कसाई हो गयी.

 

पेड़ दिखते थे जहाँ पर गाँव में,

आज चिमनी लो हवाई हो गयी.

 

एक रोपे पौध दूजा काटता,

जिन्दगी जैसे परायी हो गयी.     

.

**हरिवल्लभ शर्मा दि. 29.09.2014

 (मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 2:21pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपने ग़ज़ल पर अनुमोदन दिया...लेखनी को संबल मिला , हार्दिक आभार .कृपया स्नेह बनाये रखें.

Comment by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 2:19pm

आदरणीय Sulabh Agnihotri जी ग़ज़ल पर आपका उत्तम प्रतिसाद मिला हार्दिक आभार आपका.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2014 at 9:43pm

आदरणीय हरि वल्लभ भाई , बढ़िया ग़ज़ल हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ |

Comment by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 9:14pm

वायु पानी भी नहीं हैं शुद्ध अब,

सांस लेने में बुराई हो गयी.

वाह - वाह क्या बात है !

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 10:57pm

आदरणीय जितेन्द्र 'गीत' जी उत्साहित करती प्रतिक्रिया हेतु  आपका हार्दिक आभार.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 30, 2014 at 10:18pm

एक रोपे पौध दूजा काटता,

जिन्दगी जैसे परायी हो गयी.....वाह! .इस शेर पर विशेष रूप से बधाई आपको आदरणीय हरी जी

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 8:03pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra साहब आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार...कृपया स्नेह बनाये रखें.

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 8:00pm

आदरणीय gumnaam pithoragarhi जी आपका हार्दिक आभार...स्नेह बनाये रखें..

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 7:58pm

आदरणीय Dr Vijay Shanker जी आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया से निश्चित ही मनोबल बढाया है..हार्दिक आभार आपका...स्नेह बनाये रखें.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 30, 2014 at 5:52pm

पेड़ दिखते थे जहाँ पर गाँव में,

आज चिमनी लो हवाई हो गयी.

 

एक रोपे पौध दूजा काटता,

जिन्दगी जैसे परायी हो गयी.     आदरणीय हरिवल्लभ जी पर्यावरण के बिगड़े हालत दिखती शानदार ग़ज़ल ,,हर शेर उम्दा ..मेरी तरफ से हार्दिक बढ़ाए स्वीकार करें 

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