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दीप कोई प्रीत का अंतस जले

**दीप कोई प्रीत का अंतस जले.

 

हो चुकी है रात आधी,

घोर तम मावस पले.

इस अमा में दीप कोई,

प्रीत का अंतस जले.

--

हर तरफ खुशियाँ बिछी हैं,

द्वार तोरण से सजे.

आतिशी होते धमाके,

वाद्य मंगल धुन बजे.

कौन देता ध्यान उनपर,

भूख से मरते भले.

--

बाल दे इक दीप कोई,

रौशनी भी हो यहाँ.

झोपड़ी को राह तकते,

घिर चूका है कहकशाँ.

लूटते सारी ख़ुशी वो,

काट सकते जो गले.

--

शोषणों का दौर है ये,

मान बिकता है यहाँ,

आदमी ही आदमी के,

दाम गिनता है यहाँ.

न्याय कब मिल पायेगा,

वो हाथ यूँ कब तक मले.

--

इक तरफ तो है दिवाली,

रात काली इक तरफ.

इक तरफ है स्वर्ण पूजा,

श्रम उपासक इक तरफ.

बेबसी का दौर कैसा,

क्यों दलित पदतल दले.

--

प्रीत की बारिश कभी,

होगी नहीं इस द्वीप में.

बूँद स्वाती की कभी,

क्या आएगी इस सीप में.

मोतियों की आश में हैं,

कौन उन सबको छले.

**हरिवल्लभ शर्मा 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 8:51pm

आदरणीया rajesh kumari जी आपने रचना की सुन्दर समीक्षा कर मान दिया आपका हार्दिक आभार.कृपया स्नेह बनाये रखें.

Comment by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 8:49pm

आदरणीय narendrasinh chauhan जी बहुत आभार ,आपका अनुमोदन मिला..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2014 at 7:55pm

एक तरफ़ दिवाली दूसरी तरफ अँधियारा ..श्याम सफ़ेद दोनों ही रंगों में रंगी प्रस्तुति बहुत शानदार ,हार्दिक बधाई आपको आ० हरिवल्लभ जी .

कृपया ध्यान दे...

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