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मन में लड्डू फूटा (लघुकथा)

"भैया डीजल देना"

"कितना दे दूँ भाईसाब ?"
"अरे भैया दे दो दस पन्द्रह लिटर, देख ही रहे हो आजकल लाईट कितनी जा रही है|  रोज-रोज दूकान के चक्कर कौन लगाये|"
"हा भाईसाब इस सरकार ने तो हद कर दी है|" जैसे उसके दुःख में खुद शामिल है दूकानदार
शाम को वही दूकानदार आरती करते वक्त- "हे प्रभु अपनी कृपा यूँ ही बनाये रखना| यदि साल भर भी ऐसे ही सरकार को बुद्धि देते रहे तो बच्चे की पढ़ाई पूरी हो ही जायेगी प्रभु"

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सविता मिश्र

"मौलिक व अप्रकाशित"


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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 16, 2014 at 12:25am

पता नहीं बिजली कब एक संकल्प बन पाएगी और हमें निरंतर मिल पाएगी। फिलहाल तो डीज़ल और इन्वर्टर के विकल्प से बिजली की आपूर्ति हो रही है , कौन कहता है आभाव से लाभ नहीं होता है , बिजली के आभाव में कितने लघु उद्योग चल रहे हैं। हम इसी को विकास कहते हैं। जहां आपदा से मन में लड्डू फूटे वही सच्ची ख़ुशी है। यह है दासता की सोच , दासता की बुद्धि है , हमारे बहुत से काम अभी भी इसी सोच से हो रहे हैं।
बहुत अच्छी लघु कथा के लिए बधाई आदरणीय सविता मिश्रा जी।

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