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जिक्र तेरा भी करूँ,पर कौनसे हक़ से

लोग हैं सब पत्थरों के आजकल मैं भी
बार करते ख़न्जरों के आजकल मैं भी

लुट गयीं अब तो बहारें, सब शज़र सूखे
गीत लिखता बन्जरों के आजकल मैं भी

मुफलिसी देखी कभी फुटपाथ पर रोती 
लोग देखे बे-घरों के आजकल मैं भी

दर्द को गाते हुये देखा फकीरों को
हो गये जो दर-दरों के आजकल मैं भी

आसमाँ छूने चला हूँ जिद़ पुरानी है
उड़ रहा हूँ बिन परों के आजकल मैं भी
 
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित 


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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:05pm

आ. उमेश भाई , अब तो मतले मे ही काफिया दोष आ गया है , पत्थरों और सरफिरों को काफिया नही लिया जा सकता , समान हिस्सा रों हटाने के बाद स्वर मिलना भी ज़रूरी होता है , जो समान हिस्स- रों - हटाने के बाद ,पत्थरों में अ है और सिरफिरों मे इ है । आपको सभी काफिये अरों आने वाले शब्दों का या इरों उच्चारित होने वाले शब्दों का लेना चहिये । आपकी गज़ल के के हिसाब से मुझे अरों काफिया लेना सरल लगता है , जादा शे र आपके अरों काफिया के हैं । परों , दरों , घरों , पत्थरों , बंजरों , खंजरों ऐसे ही शब्द सही रहेंगे ।

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 6:48pm

भाईसाहब गिरिराज की कृपया एकबार और देख लें अब सही है क्या

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 2:15pm

शुक्रिया जितेन्द्र गीत साहब

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 2:14pm

शुक्रिया गिरिराज भण्डारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 11:42am

आ. मुकेश भाई , बढिया ग़ज़ल हुई है , दिली बधाई स्वीकार करें ।

आदरणीय , दूसरे , तीसरे और चौथे शे र मे काफिया ग़लत ( इरों और उरों ) है , बाक़ी शे र को  - अरों  काफिया मे  बान्धा है , देख लीजियेगा ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 1, 2014 at 10:06am

बेहतरीन मतले के साथ, बहुत लाजवाब गजल आदरणीय उमेश जी. इं दो अश आर पर आपको विशेष बधाई

जिक़्र तेरा भी करूँ, पर कौनसे हक़ से
साथ है तू शातिरों के आजकल मैं भी

आसमाँ छूने चला हूँ जिद़ पुरानी है
उड़ रहा हूँ बिन परों के आजकल मैं भी

Comment by umesh katara on October 31, 2014 at 7:24pm

शुक्रिया सुशील सरना जी

Comment by Sushil Sarna on October 31, 2014 at 11:56am

जिक़्र तेरा भी करूँ, पर कौनसे हक़ से

साथ है तू शातिरों के आजकल मैं भी … वाह हर शेर की अपनी महक, अपना वज़ूद, अपने मायने .... दिल को भा गयी आपकी ये खूबसूरत अल्फ़ाज़ों में ढली खूबसूरत ग़ज़ल … हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:41pm

shukriya Baidynath saarthi ji

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:40pm

शुक्रिया भाईसाहब narendrasinh chauhan ji

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