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कविता जब तुम,होती हो संग-संग

जीवन जीने का चाव

जहां उग जाता है

कविता कहने का भाव

वहाँ से आता है

अनुभव के बाजारों से

जो लेकर आता हूँ 

उसे ही कविता बना के

जीवन में, मैं गाता हूँ

सुख-दुःख हों जीवन के

चाहे हों उत्थान-पतन

सब कविता की कड़ियों में

छिपा लेता हूँ , करके जतन

जीवन में रहते हैं मेरे नव-रंग

कविता जब तुम होती हो संग-संग !!

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 7:59pm

आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी !

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2014 at 1:20pm

आदरणीय दुबे जी सुन्दर प्रस्तुति  //बधाई आपको 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 1, 2014 at 8:40pm

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारी जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 1, 2014 at 6:27pm

सुन्दर प्रस्तुति बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 1, 2014 at 12:55pm

आदरणीय डॉक्टर साहब ,आपका हार्दिक आभार ,मैं हिंदी भाषा का छात्र तो नहीं रहा ,न ही आप लोगों जैसा लिख पता हूँ ,पर आप जैसे लोगों के स्नेह से अभिभूत हो जाता हूँ ,प्रेरणा देने के लिए आपका हृदय से आभार ,सादर !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2014 at 10:50am

जीवन जीने का चाव

जहां उग जाता है

कविता कहने का भाव

वहाँ से आता है--------------- शुभान अल्लाह i

Comment by Hari Prakash Dubey on November 30, 2014 at 9:19pm

आदरणीय श्री गणेश जी "बागी "सार्थक प्रतिक्रिया के लिए  आपका हार्दिक आभार, एवं आपके मागदर्शन के लिए भी ! सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on November 30, 2014 at 9:14pm

सार्थक प्रतिक्रिया के लिए  आपका आभार सोमेश भाई !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2014 at 3:37pm

सुन्दर भाव, तनिक और मांजने की जरुरत है, बधाई इस प्रयास पर।

Comment by somesh kumar on November 30, 2014 at 9:31am

शायद एक लेखक का जीवन यही है जोदेखा/पढ़ा /महसूस किया उसे रचना में संजो लिया ,सुंदर प्रयास 

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