For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कोहरे के कागज़ पर
किरणों के गीत लिखें
आओ ना मीत लिखें

सहमी सहमी कलियाँ
सहमी सहमी शाखें
सहमें पत्तों की हैं

सहमी सहमी आँखें

सिहराते झोंकों के
मुरझाए
मौसम पर
फूलों की रीत लिखें

आओ ना मीत लिखें 

रातों के ढर्रों में
नीयत है चोरों की
खीसें में दौलत है
सांझों की भोरों की

छलिया अँधियारो से
घबराए,
नीड़ों पर
जुगनू की जीत लिखें

आओ ना मीत लिखें 

गूँज रहा सन्नाटा
सूरज के घर-आँगन
धुआँ धुआँ धूप हुयी
सौंप घना सूनापन

धरती से सूरज के
रूखे
संवादों पर
निहुराई प्रीत लिखें

आओ ना मीत लिखें

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 333

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 6:59pm

आदरणीय सीमा अग्रवाल जी , इस सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई आपको ,इस रचना पर अब ध्यान गया उस समय १५ दिन कार्य से बाहर था ...

छलिया अँधियारो से 

घबराए, 
नीड़ों पर 
जुगनू की जीत लिखें

आओ ना मीत लिखें......बहुत खूब ! सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 19, 2015 at 11:13pm
कोहरे के कागज़ पर
किरणों के गीत लिखें
आओ ना मीत लिखें ॥
सुन्दर एवं सुरुचि पूर्ण , आदरणीय सीमा जी, बधाई, सादर।
Comment by seema agrawal on January 19, 2015 at 10:57pm

मैं तो यहाँ से कभी गयी ही नहीं अर्चना ................. :) खुश रहो 

Comment by seema agrawal on January 19, 2015 at 10:56pm

बहुत बहुत शुक्रिया मंजरी जी आपकी उपस्थिति से गीत का मान बढ़ा ...............धन्यवाद देने थोडा देर से आ सकी  इस बात के लिए माफी चाहती हूँ 

Comment by seema agrawal on January 19, 2015 at 10:54pm

खुश रहिये सोमेश जी ........सराहना करने का आपका ये अंदाज़ अच्छा लगा  ................

 :)

Comment by seema agrawal on January 19, 2015 at 10:52pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी आप जैसे सुधि पाठक की सराहना पा कर उत्साहित हूँ ............... अपना धन्यवाद थोड़ा विलम्ब से पहुंचा सकी इसके लिए क्षमा प्रार्थी भी हूँ 

Comment by seema agrawal on January 19, 2015 at 10:49pm

बहुत बहुत शुक्रिया  मिथिलेश वामनकर जी ............थोड़ा विलम्ब से पहुंचा सकी अपना धन्यवाद  इसके लिए क्षमा प्रार्थी भी हूँ 

Comment by seema agrawal on December 24, 2014 at 12:17am
आदरणीय सौरभ जी पंक्ति दर पंक्ति गीत की सम्यक व्याख्या कर आपने जिस प्रकार गीत को स्नेह दिया सच कहूँ तो अभिभूत हूँ आपकी इस सदाशयता से । धन्यवाद शब्द बहुत छोटा है ।
Comment by seema agrawal on December 24, 2014 at 12:11am
आप सभी ने गीत पर उपस्थित हो कर जो मान दिया उसके लिए जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम है ।गीत पोस्ट करने के बाद से ही लगातार व्यस्त होने के कारण आप सब के बीच उपास्थित न हो सकी अतः इस विलम्ब के लिए आप सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ । पुनः धन्यवाद ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 21, 2014 at 2:33pm

आदरणीया सीमाजी, एक अरसे बाद आपकी प्रस्तुति को इन पन्नों में देखना भावविभोर कर गया.
पद्य में प्रकृति का मानवीकरण छायावाद काल का महत्त्वपूर्ण पहलू रहा है. इस काल के उत्तर काल-खण्ड में यथार्थ प्रस्तुतीकरण के वशीभूत कई प्रस्तुतियाँ भावहीन होने लगी थीं. जो आधुनिक काल तक आते-आते प्रस्तुतियों मेम् विद्रूप वर्णन या भदेसपन का समावेश एक गुण की तरह स्वीकार किया जाने लगा. पेट, रोटी, दिल्ली, मादा शरीर, शरीर की भूख से सनी कविताएँ सिर चढ़ कर चीखने लगीं.


ऐसे में छायावाद या उत्तर छायावाद के वायव्य तथा यथार्थ के नाम पर आधुनिक कविताओं के विद्रूप वर्णन के बीच नवगीत की मुलामीयत चुपचाप संतुलन का काम करती रही.
आपके प्रस्तुत नवगीत को मैं इसी आलोक में देख रहा हूँ.  

नवधनाढ्यों से अँटे समाज में विडंबनाओं पर बोलना कई बार नक्कारखाने में तुती की आवाज़ बन कर रह जाती है. लेकिन कवि भी कब रुकता है ! आपकी प्रस्तुत पंक्तियों को इसी संदर्भ में देखना भला लगा -
रातों के ढर्रों में / नीयत है चोरों की / खीसें में दौलत है / सांझों की भोरों की / .. / छलिया अँधियारो से / घबराए, / नीड़ों पर / जुगनू की जीत लिखें / आओ ना मीत लिखें

तो उधर प्रेमपगी भावनाओं को आपने अपेक्षित दुलार से सराहा है -
सहमी सहमी कलियाँ / सहमी सहमी शाखें / सहमें पत्तों की हैं / सहमी सहमी आँखें /
सिहराते झोंकों के / मुरझाए मौसम पर / फूलों की रीत लिखें.. ! वाह !!

परस्पर सामञ्जस्य और समावेशी आचरण में वैयक्तिकता तथा अहं का अनएवोडाइबल इण्ट्रूजन कई विसंगतियों को जन्म देता रहा है. ऐसे विन्दुओं को मुखर करना आधुनिक कवि तथा नवगीतकार अपना अधिकार तो समझते ही हैं, इस विन्दु पर बोलना इनकी मजबूरी भी है. है न ? -
गूँज रहा सन्नाटा / सूरज के घर-आँगन / धुआँ धुआँ धूप हुयी / सौंप घना सूनापन / .. / धरती से सूरज के / रूखे संवादों पर / निहुराई प्रीत लिखें

इस नवगीत के पहलुओं पर सोचते हुए कई जानी-अनजानी बातें खुलती गयीं, आदरणीया.
हृदय से बधाइयाँ व असीम शुभकामनाएँ.
सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"प्रिय भाई योगराज जी, कई दिनों बाद आज ओ बी ओ पर हाज़िर हुआ हूँ, दुःखद समाचार मिला,  बहुत अफ़सोस…"
yesterday
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय योगराज जी की जीवन संगिनी के चिर विछोह के इस दारुण दुःख दायक क्षणों में ओबीओ , लखनऊ चैप्टर…"
Monday
Krish mishra updated their profile
Monday
Krish mishra and vijay nikore are now friends
Monday
Krish mishra replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"अत्यंत हृदय विदारक! ईश्वर उन्हें इस दुःख की घड़ी में संबल दें। ॐ शांति।"
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"ओह ! अत्यंत दुखद समाचार. ईश्वर योगराज जी एवं उनके परिवार को इस आघात को सहने की शक्ति प्रदान करे.…"
Sunday
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"हम इस दुख की घड़ी में योगराज सर और उनके परिवार के साथ हैं, ईश्वर इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे…"
Sunday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण सर, सादर अभिवादन सहित आभार"
Saturday
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"बेहद दुख:द समाचार। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें। ओम शांति।"
Saturday
Samar kabeer replied to Admin's discussion "OBO लाइव तरही मुशायरे"/"OBO लाइव महा उत्सव"/"चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता के सम्बन्ध मे पूछताछ
"मुख्य पृष्ठ पर आयोजन कैलेंडर देखें,आयोजन की भूमिका पढ़ें वहीं पोस्ट करने का तरीक़ा भी लिखा हुआ है ।"
Saturday
Mukesh Sharma replied to Admin's discussion "OBO लाइव तरही मुशायरे"/"OBO लाइव महा उत्सव"/"चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता के सम्बन्ध मे पूछताछ
"आद. तरही मुशायरे की पोस्ट कहाँ होती है। "
Saturday
Mukesh Sharma replied to Admin's discussion "OBO लाइव तरही मुशायरे"/"OBO लाइव महा उत्सव"/"चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता के सम्बन्ध मे पूछताछ
"ताजा मुशायरे का मिसरा कहाँ, किस जगह दिया होता है आद. "
Saturday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service