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ग़ज़ल : आजमाते पंख के फैलाव को.

2122,2122,212

सह सके ना फूल के टकराव को.

हैं मुकाबिल झेलने सैलाव को.

थामना पतवार सीखा है नहीं.

हैं चले खेने बिफरती नाव को.

हौसला उनका झुकाता आसमां.

आजमाते पंख के फैलाव को.

हर सफलता चूमती उनके कदम,

आजमाते वक़्त पर जो दाव को.

भाव उनके भी गिरेंगे एक दिन,

भूल जाते हैं सरे सद्भाव को.

.

हरिवल्लभ शर्मा दि. 04.01.2015

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on January 5, 2015 at 8:46pm

सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई सर 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 5, 2015 at 6:18pm

हर सफलता चूमती उनके कदम,

आजमाते वक़्त पर जो दाव को. … सुन्दर रचना ..हार्दिक बधाई आदरणीय हरिवल्लभ शर्मा जी ,  सादर!

Comment by ram shiromani pathak on January 5, 2015 at 3:23pm

ज़ोरदार कहन आदरणीय//हार्दिक बधाई आपको 

Comment by harivallabh sharma on January 5, 2015 at 2:14am

आदरणीय  Rahul Dangi साहब हार्दिक आभार आपने ग़ज़ल पर हौसला बढाया..सादर.

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 4, 2015 at 8:42pm
सुन्दर गजल आदरणीय

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