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ग़ज़ल- छुट्टियों के दिन

मस्कुराते हैं छुट्टियों के दिन
कम ही आते हैं छुट्टियों के दिन

कंपकंपाते हैं छुट्टियों के दिन  

थरथराते हैं छुट्टियों के दिन 

देखो सचमुच में थक गये हैं हम,
ये बताते हैं छुट्टियों के दिन


सैंकडों काम छोड कर बाकी
भाग जाते हैं छुट्टियों के दिन


सपनों के बोझ में दबे बच्चे
खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन


चार दिन घर में रह नहीं पाये,
अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन

आदतें और थकान,आलस को 

और बढाते हैं छुट्टियों के दिन  

दफ़्तरों में छुपे कबूतर को 

मुंह चिढाते हैं छुट्टियों के दिन  

जैसे बरसों से भूखे-प्यासे थे  

खूब खाते हैं छुट्टियों के दिन 

सूबे सिंह सुजान

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:54pm

 मिथिलेश वामनकर,जी शुक्रिया.....आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 11:40pm

चार दिन घर में रह नहीं पाये,
अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन...

आदरणीय सूबे सिंह जी  बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करे 

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:32pm

 Dr Ashutosh Mishra, जी, मेरी ओर से आपको विशेष धन्यवाद . छुट्टियों में लिखी गई इस रचना पर आप महानुभावों के विचार आये तो दिल को अच्छा ही लगा। 

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:30pm

 khursheed khairadi, जी भाई साहब, आभार है आपकी पसंदगी पर

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:29pm

 somesh kumar, जी ,आपको रचना अच्छी लगी पढकर मन को और भी अच्छा लगा। आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 6, 2015 at 5:31pm

आदरणीय सुजान जी 

सैंकडों काम छोड कर बाकी 
भाग जाते हैं छुट्टियों के दिन

जैसे बरसों से भूखे-प्यासे थे  

खूब खाते हैं छुट्टियों के दिन

सपनों के बोझ में दबे बच्चे 
खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन...बेहतरीन ग़ज़ल के इन अशारो के लिए बिसेष रूप से मेरी बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by khursheed khairadi on January 6, 2015 at 11:21am

सपनों के बोझ में दबे बच्चे 
खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन


चार दिन घर में रह नहीं पाये,
अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन

आदरणीय सूबे सिंह सर बहुत ख़ूब , बहुत याद आते हैं जब बीत जाते हैं छुट्टियों के दिन |सादर अभिनन्दन 

Comment by somesh kumar on January 6, 2015 at 10:47am

बहुत भाते हैं छुट्टियों के दिन /

मन को हल्का करने वाली इस सुंदर रचना पर बधाई 

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 5, 2015 at 11:00pm

 डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव,    जी आपका हृादिक आभार प्रकट करता हूँ।  कृपया पधारते रहें।

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 5, 2015 at 10:58pm

 मिथिलेश वामनकर     

जी आपकी प्रतिक्रिया पर आपका धन्यवाद बहुत अच्छा  लगा आपका पधारना। 

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