For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

 

कुछ माह पहले

 

पैरों में लिपटते थे सांप

कीचड में सनते थे

पैर और वाहन

पसीने से चुभते थे वपुष में कांटे

धुप में झुलसी जाती थी देह

कुछ माह पहले  

 

नभ से बरसता था

थका-थका मेह

पुरवा से ऐठती थी ठाकुर की देह

क्वार की धूप में हांफता था बैल   

कुछ माह पहले

 

हवा में नमी थी

चलता न वात 

पंखा हांकने से सूखता न गात

बरगद के नीचे भी ठंढी न छाँव

हिलते नहीं नीम- जामुन के पाँव  

कुछ माह पहले 

 

लोग कहते

अमा कातिक की हो

गर्मी से मिले त्राण

किसी तरह बचे आफत से प्राण

जाड़े में तपते की आग ही भली

और चिनियाबादाम मूंग की फली

कुछ माह पहले  

 

शीत ने जगाया

तनिक चैन आया

कुछ दिन बीते छाया कुहरा घना

बादल के पीछे-पीछे सूरज अनमना

बर्फीली आन्धी ने ढाया चुप कहर

हाड़ कपाती है शीत की लहर

इससे तो ठीक थे गर्मी के दिन  

कुछ माह पहले

 

पूस ने चढ़ाई की

दांत लगे बजने

ओस से दूब पर मोती लगे सजने

धुंध का पसारा किया जाड़े की धज ने     

काम बंद, धाम बंद सहज नहान बंद

मुमकिन नहीं है अब कैसे लौट जांए    

कुछ माह पहले

 

वर्तमान नहीं देता

कभी संतुष्टि

आत्मा जीव की

न पाती कभी तुष्टि

सबको सदा अतीत है भाता

आवरण में लिपटा भविष्य है डराता

आह कितना कष्ट है आज और अब

जो कुछ व्यतीत हुआ कितना था भव्य

कुछ माह पहले ! 

(मौलिक व् अप्रकाशित )

Views: 549

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 16, 2015 at 3:22pm

प्रतिभा जी

आपका आभारी हूँ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 16, 2015 at 3:21pm

अनुज भंडारी जी

अनुगृहीत हुआ i सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 1:08pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , वर्तमान से असंतुष्टि , भविष्य का भय और अतीत का बखान , मानव की सहज मानसिकता को इस कविता मे आपने जीवंत कर दिया । बहुत सुन्दर कविता ! आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 15, 2015 at 12:40pm

आ० वामनकर जी

आपका स्नेह सदैव मेरी  कलम मांजता रहे i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 15, 2015 at 12:39pm

हरि प्रकाश जी

आपकी साहित्यिक पकड़ का मैं कायल हूँ i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 15, 2015 at 12:38pm

विजय सर !

मेरे गीतों के संग आप भी गुनगुनाये i इससे अच्छा  और क्या हो सकता है i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 15, 2015 at 12:36pm

सोमेश जी

आपकी साहित्यिक अभिरुचि की  मैं कद्र करता हूँ i सस्नेह i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 15, 2015 at 12:35pm

खुर्शीद भाई

आपका प्रोत्साहन इसी प्रकार मिकता रहे  i सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:06pm

 आदरणीय डॉo गोपाल नारायण सर इस सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई....नमन 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 7:52pm

ऋतुओं के माध्यम से आपने मानव जीवन के वर्तमान मनोभावों ,उसकी स्थिति का सजीव वर्णन कर दिया .
आवरण में लिपटा भविष्य है डराता
आह कितना कष्ट है आज और अब
जो कुछ व्यतीत हुआ कितना था भव्य
कुछ माह पहले !....... सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर ! सादर !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश जी स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"  जी ! //हापुस लँगड़ा नीलम केसर। आम सफेदा चौसा उस पर।।//... कुछ इस तरह किया जा सकता है.…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service