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‘पता चला है सेठ से तुम्हारे पुराने सम्बन्ध थे ?’- इंस्पेक्टर ने कड़क कर पूंछा I

‘जी हाँ ----I’

‘कैसे सम्बन्ध थे ?’

‘एक समय मै रखैल थी उसकी I’

‘तब तूने उसकी हत्या क्यों की ?’

‘क्योंकि वह मनुष्य नहीं राक्षस था I वह मेरी बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने जा रहा था I मैंने साले को वही चाकू से गोद दिया I’

‘तो तेरी बेटी क्या सती सावित्री थी ?’

‘नहीं साहिब , हम जैसे लोग पेट के लिए देह बेचते है I सती -सावित्री होना हमारे लिये गाली है पर मैंने उस मुंहजले को सारी सच्चाई तो पहले ही बता दी थी, फिर  उस पर शैतान क्यों सवार हो गया !’

‘कैसी सच्चाई ?’

‘यही कि  वह सेठ ही मेरी लडकी का बाप था I’

(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 12, 2015 at 7:30pm

आदरणीय दादा शरदिंदु जी

आपका स्नेह ही मेरा पाथेय है i सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on February 3, 2015 at 5:31pm
अचम्भित होना पड़ता है ऐसी रचना पढ़कर. सबसे अलग विद्वता की छाप सुस्पष्ट है आदरणीय.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2015 at 11:22am

आ 0 अनुज

आपका हृदय से आभार i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 14, 2015 at 10:05am

नेआदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , क्या कहूँ ? आदरणीय सौरभ भाई जी ने सही कहा है , अंतिम पंच लाइन पढ के सच मे दिमाग मे सन्नाटा छा गया । समाज का एक काला पक्ष ये भी है ! लघु कथा के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 13, 2015 at 5:40pm

आ 0 सौरभ जी

आपका हार्दिक आभार i  त्रुटि का परिमार्जन लाजिमी है i सादर i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 13, 2015 at 5:35pm

ओह !  क्या कहा जाय ? समाज का यह पक्ष मात्र स्याह ही नहीं बल्कि दाँतुल भी है ! पशुवत !

प्रस्तुति के कथ्य पर क्या कहूँ ? दिमाग़ सुन्न है. 

एक बात :

यही की की जगह यही कि होना चाहिये.

ऐसी प्रस्ततियों की पंच लाइनें व्याकरण के तौर पर बेदाग़ हों तो उनका प्रभाव अत्यंत गहन हुआ करता है. 

सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 13, 2015 at 5:11pm

लडीवाला जी

आपका सादर आभार i

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 12, 2015 at 4:19pm

हवस से बड़ा कोई नशा नहीं जिसमे डूबा आदमी को किसी  रिश्तें का खयाल नहीं रहता | बहुत सुंदर लघु कथा  के लिए बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 12, 2015 at 4:14pm

जीतू भाई

आपका स्नेह जिंदाबाद i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 12, 2015 at 4:13pm

खैराबादी जी

अति कृतज्ञ हूँ i

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